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दरअसल, भारत-अमेरिका रिश्ते केवल व्यक्तिगत संवाद से नहीं, बल्कि ठोस व्यापार और सामरिक हितों पर टिके हैं। हाल के दिनों में टैरिफ विवाद ने दोनों देशों की साझेदारी पर सवाल खड़े कर दिए थे। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी तक का टैरिफ लगाया, जिससे झींगा मछली के कारोबारियों जैसे छोटे निर्यातक बुरी तरह प्रभावित हुए। अकेले आंध्र प्रदेश के निर्यातकों को 25 हजार करोड़ रुपए तक का नुकसान उठाना पड़ा।
फिर भी भारत ने हार नहीं मानी। टैरिफ की चोट के बावजूद उसका निर्यात 7 फीसदी बढ़ा और आयात 10 फीसदी घटा। साफ है कि भारत का व्यापार ढांचा अब पहले से कहीं मजबूत है। लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी क्षेत्र को खोल दे। उसका सवाल है कि 140 करोड़ लोगों का देश अमेरिका मक्का का एक बुशेल भी क्यों नहीं खरीद सकता? भारत इसका प्रतिवाद करता है—किसानों की आजीविका को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। यही व्यापार समझौते की सबसे बड़ी अड़चन है।
फिर भी सकारात्मक संकेत मिलने लगे हैं। अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि ब्रेंडन लिंच ने हाल ही में दिल्ली में 7 घंटे तक बातचीत की और दोनों पक्षों ने वार्ता को ‘सकारात्मक’ करार दिया। यह भले ही आधिकारिक संवाद का छठा चरण नहीं था, लेकिन रिश्तों में नरमी का संकेत ज़रूर है। ट्रंप-मोदी संवाद और व्यापार वार्ता, दोनों मिलकर यह साबित कर रहे हैं कि झगड़े और झूठ से आगे बढ़कर रिश्तों को बचाना ही दोनों देशों के हित में है।
भारत के लिए यह दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अमेरिका जैसे बड़े साझेदार के साथ संबंध मजबूत रखने हैं, तो दूसरी ओर अपनी आत्मनिर्भरता और किसानों-व्यापारियों की रक्षा भी करनी है। यही असली कसौटी है। प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि भारत-अमेरिका साझेदारी ‘वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाई छुएगी’, केवल बयान नहीं, बल्कि चुनौती भी है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह बार-बार देखा गया है कि नेता अपनी घरेलू राजनीति चमकाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर दावे करते हैं। लेकिन अंततः देशों के रिश्ते वास्तविकताओं पर टिकते हैं। भारत और अमरीका के बीच जो नई खिड़की खुली है, उसमें से ठंडी हवा ही आनी चाहिए, बयानबाज़ी की तपिश नहीं। यही रिश्तों की असली मजबूती होगी।