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गाजर घास (पार्थेनियम हिस्ट्रोफोरस), जिसे तारा घास, गंधी बूटी एवं पंधारी फूल या चटक चांदनी आदि नाम से भी जाना जाता है। यह एक आक्रामक खरपतवार है जो फसलों, मनुष्यों और पशुओं के लिए हानिकारक है। माना जाता है कि यह घास 1950 के दशक में अमेरिका और कनाड़ा से आयातित गेहूं के साथ भारत में आई थी और अब यह देश भर में फैल चुकी है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में 1950 के दशक में पुणे और महाराष्ट्र में इसे सबसे पहले देखा गया। बरसात के मौसम में इस घास की प्रचुर मात्रा में वृद्धि होती है, लेकिन यह पौधा हर तरह के वातावरण में तेजी से उठकर फसलों, मनुष्य और पशुओं के लिए एक गंभीर समस्या है। इसे अक्सर खाली पड़ी जमीनों, सडक़ों, रेलवे ट्रैक और बंजर भूमि पर देखा जाता है। हमारे नीमच की बात करें तो यहां स्कूल मैदान, खुले पड़े भूखंडों, शासकीय परिसरों और सड़कों के किनारे यह पौधा बहुतायत में पाया जाता है। अब तो यह घास गांव, खेत और खलिहान तक पहुंच गई है। यहां तक की रहवासी बस्तियों में भी इसके पौधे पनप रहे हैं। हर साल इस समस्या से निपटने की बाते होती है। नेता से लेकर अधिकारी तक अभियान चलाने और गाजर घास उन्मूलन के दावे करते हैं,लेकिन यह नष्ट होने की बजाए साल दर साल व्यापक क्षेत्र में फैलती जा रही है। इसके लिए कुछ हद तक हम लोग भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि बस्तियों में गाजर घास को नष्ट करने में हम भी योगदान दे सकते हैं,लेकिन हम इसके लिए केवल स्थानीय निकाय और प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहरा कर दायित्व से पल्ला झाड़ लेते हैं। सेवानिवृत्त ग्रामीण कृषि विकास अधिकारी नेमीचंद पाटीदार बताते हैं कि गाजर घास आज पूरे देश में एक महामारी के रूप में फैल रही है। दूसरे देशों से आए इस खरपतवार ने अधिकांश भूमि पर कब्जा जमा लिया है। फसलों ही नहीं, मानव व पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह काफी हानिकारक है। किसानों द्वारा इसे नष्ट करने के तमाम उपाय असफल सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो के वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पौधे को समूल नष्ट करना आसान नहीं तो असंभव भी नहीं है। हां, इसके लिए कुछ सावधानियां भी बरती जानी आवश्यक हैं। बता दें कि गाजर घास की वजह से प्रतिवर्ष खाद्यान्न की पैदावार में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आंकी गई है। हर प्रकार के वातावरण में उगने वाली अभूतपूर्व क्षमता से युक्त गाजर घास एक वर्षीय पौधा है। यह 90 सेमी से एक मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां गाजर या गुलदाउदी की पत्तियों की तरह होती है। पौधे साल भर उगते हैं। सफेद रंग के छोटे-छोटे फूल होते है। फूल और बीज हर मौसम में आते हैं। प्रत्येक पौधा 5000 से 50,000 की संख्या में प्रतिवर्ष बीज पैदा करता है। गाजर घास के परागकणों की वजह से टमाटर, बैंगन, मिर्च जैसे सब्जियों के फूल गिर जाते हैं। इसके परागकण ऐसा रसायन उत्सर्जित करते हैं, जिससे पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले बैक्टीरिया निष्प्रभावी हो जाते हैं। जब जानवर इसे खाते हैं तो उनके दूध का स्वाद कसैला हो जाता है। लंबे समय तक ऐसे दूध का सेवन करने से मौत भी हो सकती है। मनुष्य में इससे कई तरह के चर्म रोग होते हैं। चमड़ी सख्त हो जाती है और उसमें घाव बन जाता है। लगातार संपर्क में रहने से एक्जिमा की तरह प्रभाव पड़ता है। नाक व आंखों को भी प्रभावित करता है। ज्वर एवं अस्थमा जैसे रोग पैदा होते हैं। इसमें पाया जाने वाला पार्थिनिम नामक रसायन नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर डिप्रेशन की बीमारी पैदा करता है। इसकी उपस्थिति के कारण स्थानीय वनस्पतियां नहीं उगतीं और पर्यावरण को नुकसान होता है। इसके नियंत्रण हेतु विभिन्न फसलों में रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इस घास को फूल आने से पहले ही निकाल कर नष्ट कर दिया जाए तो इसका प्रसार रोका जा सकता है। पौधे को उखाड़ते समय हाथ में दस्ताने या पालीथीन लपेट लेना चाहिए। पौधे का शरीर से सीधा संपर्क नहीं होना चाहिए। इसे दराती से काटने के बजाय जड़ से उखाड़ना चाहिए वरना ये पुन: तेजी से बढ़ते है। खर पतवार को 2, 4-डी, मैट्रीव्यूजीन या ग्लाइफोसेट को 600-800 लीटर पानी में घोल बनाकर या 100 लीटर पानी में 8-10 किलो सादा नमक का घोल बनाकर छिड़काव कर नष्ट किया जा सकता है। गाजर घास का जैविक नियंत्रण मैक्सिकन बिटल (जाइगोग्रामा बाइपोलोरेटा) द्वारा भी किया जा सकता है। वैसे गाजर घास को नियंत्रित करने के लिए सामुदायिक पहल की जरुरत है। जिसमें किसानों, नगर पालिकाओं, गैर सरकारी संगठनों और आम जनता को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इसके लिए गाजर घास के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों को शिक्षित करना महत्वपूर्ण है। |
गाजर घास (पार्थेनियम हिस्ट्रोफोरस), जिसे तारा घास, गंधी बूटी एवं पंधारी फूल या चटक चांदनी आदि नाम से भी जाना जाता है। यह एक आक्रामक खरपतवार है जो फसलों, मनुष्यों और पशुओं के लिए हानिकारक है। माना जाता है कि यह घास 1950 के दशक में अमेरिका और कनाड़ा से आयातित गेहूं के साथ भारत में आई थी और अब यह देश भर में फैल चुकी है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में 1950 के दशक में पुणे और महाराष्ट्र में इसे सबसे पहले देखा गया। बरसात के मौसम में इस घास की प्रचुर मात्रा में वृद्धि होती है, लेकिन यह पौधा हर तरह के वातावरण में तेजी से उठकर फसलों, मनुष्य और पशुओं के लिए एक गंभीर समस्या है। इसे अक्सर खाली पड़ी जमीनों, सडक़ों, रेलवे ट्रैक और बंजर भूमि पर देखा जाता है।
हमारे नीमच की बात करें तो यहां स्कूल मैदान, खुले पड़े भूखंडों, शासकीय परिसरों और सड़कों के किनारे यह पौधा बहुतायत में पाया जाता है। अब तो यह घास गांव, खेत और खलिहान तक पहुंच गई है। यहां तक की रहवासी बस्तियों में भी इसके पौधे पनप रहे हैं। हर साल इस समस्या से निपटने की बाते होती है। नेता से लेकर अधिकारी तक अभियान चलाने और गाजर घास उन्मूलन के दावे करते हैं,लेकिन यह नष्ट होने की बजाए साल दर साल व्यापक क्षेत्र में फैलती जा रही है। इसके लिए कुछ हद तक हम लोग भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि बस्तियों में गाजर घास को नष्ट करने में हम भी योगदान दे सकते हैं,लेकिन हम इसके लिए केवल स्थानीय निकाय और प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहरा कर दायित्व से पल्ला झाड़ लेते हैं।
सेवानिवृत्त ग्रामीण कृषि विकास अधिकारी नेमीचंद पाटीदार बताते हैं कि गाजर घास आज पूरे देश में एक महामारी के रूप में फैल रही है। दूसरे देशों से आए इस खरपतवार ने अधिकांश भूमि पर कब्जा जमा लिया है। फसलों ही नहीं, मानव व पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह काफी हानिकारक है। किसानों द्वारा इसे नष्ट करने के तमाम उपाय असफल सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो के वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पौधे को समूल नष्ट करना आसान नहीं तो असंभव भी नहीं है। हां, इसके लिए कुछ सावधानियां भी बरती जानी आवश्यक हैं।
बता दें कि गाजर घास की वजह से प्रतिवर्ष खाद्यान्न की पैदावार में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आंकी गई है। हर प्रकार के वातावरण में उगने वाली अभूतपूर्व क्षमता से युक्त गाजर घास एक वर्षीय पौधा है। यह 90 सेमी से एक मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां गाजर या गुलदाउदी की पत्तियों की तरह होती है। पौधे साल भर उगते हैं। सफेद रंग के छोटे-छोटे फूल होते है। फूल और बीज हर मौसम में आते हैं। प्रत्येक पौधा 5000 से 50,000 की संख्या में प्रतिवर्ष बीज पैदा करता है।
गाजर घास के परागकणों की वजह से टमाटर, बैंगन, मिर्च जैसे सब्जियों के फूल गिर जाते हैं। इसके परागकण ऐसा रसायन उत्सर्जित करते हैं, जिससे पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले बैक्टीरिया निष्प्रभावी हो जाते हैं। जब जानवर इसे खाते हैं तो उनके दूध का स्वाद कसैला हो जाता है। लंबे समय तक ऐसे दूध का सेवन करने से मौत भी हो सकती है। मनुष्य में इससे कई तरह के चर्म रोग होते हैं। चमड़ी सख्त हो जाती है और उसमें घाव बन जाता है। लगातार संपर्क में रहने से एक्जिमा की तरह प्रभाव पड़ता है। नाक व आंखों को भी प्रभावित करता है। ज्वर एवं अस्थमा जैसे रोग पैदा होते हैं। इसमें पाया जाने वाला पार्थिनिम नामक रसायन नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर डिप्रेशन की बीमारी पैदा करता है। इसकी उपस्थिति के कारण स्थानीय वनस्पतियां नहीं उगतीं और पर्यावरण को नुकसान होता है।
इसके नियंत्रण हेतु विभिन्न फसलों में रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इस घास को फूल आने से पहले ही निकाल कर नष्ट कर दिया जाए तो इसका प्रसार रोका जा सकता है। पौधे को उखाड़ते समय हाथ में दस्ताने या पालीथीन लपेट लेना चाहिए। पौधे का शरीर से सीधा संपर्क नहीं होना चाहिए। इसे दराती से काटने के बजाय जड़ से उखाड़ना चाहिए वरना ये पुन: तेजी से बढ़ते है। खर पतवार को 2, 4-डी, मैट्रीव्यूजीन या ग्लाइफोसेट को 600-800 लीटर पानी में घोल बनाकर या 100 लीटर पानी में 8-10 किलो सादा नमक का घोल बनाकर छिड़काव कर नष्ट किया जा सकता है। गाजर घास का जैविक नियंत्रण मैक्सिकन बिटल (जाइगोग्रामा बाइपोलोरेटा) द्वारा भी किया जा सकता है।
वैसे गाजर घास को नियंत्रित करने के लिए सामुदायिक पहल की जरुरत है। जिसमें किसानों, नगर पालिकाओं, गैर सरकारी संगठनों और आम जनता को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इसके लिए गाजर घास के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों को शिक्षित करना महत्वपूर्ण है।