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नीमच में मौसमी बीमारियों और मच्छर जनित समस्याओं का प्रकोप किसी अगली चेतावनी की तरह नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बरसात आने से पहले ही शहर की गलियाँ, नाले–नाली, खुली प्लॉट्स गंदगी और जलभराव का अड्डा बन गए। फिर लगातार बारिश हुई। इस अवस्था में मलेरिया, डेंगू और अन्य बुखार जैसी बीमारियाँ तेजी से पनप रही हैं, और जनता प्रशासनिक लापरवाही की राजनीति की कीमत चुका रही है। नीमच का मौजूदा स्वास्थ्य संकट सिर्फ मौसम की मार नहीं है, बल्कि प्रशासन और स्थानीय निकायों की उदासीनता का प्रदर्शित प्रमाण है। डेंगू, मलेरिया और अन्य मौसमी बीमारियों के बढ़ते मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जिम्मेदार विभागों ने समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए। वैसे भी सितंबर का महीना नीमच जिले में मानसूनी मौसम का चरम होता है। अगस्त-सितंबर में हुई वर्षा से वातावरण में नमी बढ़ जाती है, तापमान दिन में कम और रात में अपेक्षाकृत ठंडा महसूस होता है। इस मौसमी स्थिति में बीमारियों का प्रसार आसान हो जाता है। खासकर जलजनित, वायुजनित तथा कीट जनित रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। नीमच में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उपलब्ध सामान्य जानकारी से साबित होता है कि जिले के अस्पतालों की नर्सरी और एसएनसीयू जैसी इकाइयों में शिशुओं की मृत्यु दर चिंताजनक रही है, जहाँ एक वर्ष में 252 बच्चों की मौत हुई है। इन मौतों के कारणों में सेप्टीसिमिया (रक्त विषाणुता), निमोनिया, डायरीया इत्यादि शामिल हैं। सबसे पहला प्रश्न उठता है कि क्या स्थानीय निकाय और नगर पालिका, नगर परिषद और ग्राम पंचायतें ऐसी खुली ज़मीनों की नियमित देखरेख कर रही हैं..? क्योंकि अब तक की खबरों के अनुसार ऐसे खुला प्लॉट, वेड-जंगली एवं कूड़े–करकट से भरे स्थान, मच्छरों के पनपने के लिए स्वर्ग बने हुए हैं। प्रशासन के पास पावर है, भूखंड—स्वामियों को नोटिस जारी करने का, कार्रवाई करने का, लेकिन आलोचना यह है कि नोटिसों के बाद ठोस कार्रवाई नहीं होती। फिलहाल केवल कागज़ों में ही काम हो रहा है। दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। नीमच सहित जिले के कई क्षेत्र ‘मलेरिया सर्वेक्षण’ के दायरे से बाहर दिखते हैं। जब बीमारी नियंत्रण प्रणाली, संक्रमण की निगरानी घटाएँ या धीरे हो जाए, तो मरीजों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ती है। अस्पतालों में मरीजों की भीड़, डॉक्टरों की कमी, दवाइयों का अभाव, ये सभी संयोजन एक खतरनाक स्थिति बनाते हैं। देखा जा रह है कि शहर और गांवों में पंचायत मुख्यालयों तक साफ-सफाई की स्थिति चिन्ताजनक है। वर्षा से पहले ढ़ेरों काम बचे रहते हैं—नालियों की सफाई, जलजमाव जहाँ–जहाँ हो रहा हो वहाँ का तुरंत निस्तारण। लेकिन अधिकारियों की सूझ–बूझ अक्सर इस एक्शन की शुरुआत से ही कम पड़ जाती है। जनप्रतिनिधियों और राजनैतिक प्रभुत्व वाले स्वामी खुले प्लॉट छोड़ देते हैं, प्रशासन बहाना खोजता है कि “स्वामी प्रभावी है” या “जिम्मेदार नहीं मिल रहे”। इस तरह, जनता प्रभावित होती है—बच्चे संक्रमित होते हैं, आर्थिक बोझ बढ़ता है। प्रशासन के लिए यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, एक नैतिक परीक्षण है। सरकारी तंत्र का काम सिर्फ फैसले लेना नहीं है, उन्हें अमल में लाना है। हर वार्ड में नियमित निरीक्षण हों, साप्ताहिक स्तर पर एंटी-लार्वा मीटिंग की जाए, जलभराव को बंद करने के ठोस उपाय हों, और यदि आवश्यकता हो तो कानूनी कार्रवाई हो। साथ ही, जनता को भी संवेदनशील होना चाहिए—स्वयं की जिम्मेदारी और साफ-सफाई की पहल करनी चाहिए। नीमच की जनता अब और दोषारोपण नहीं सुनना चाहती, वह चाहती है कि प्रशासन बहु‑स्तर पर काम करे—मच्छर नियंत्रण, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और पारदर्शी कार्रवाई। मौसमी बीमारियाँ कोई प्राकृतिक आपदा नहीं हैं जिन्हें टाला न जा सके; ये हमारी भूलों और असावधानियों के पैमाने हैं। समय रहते जागो, नीमच! समय रहते काम करो! |
नीमच में मौसमी बीमारियों और मच्छर जनित समस्याओं का प्रकोप किसी अगली चेतावनी की तरह नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बरसात आने से पहले ही शहर की गलियाँ, नाले–नाली, खुली प्लॉट्स गंदगी और जलभराव का अड्डा बन गए। फिर लगातार बारिश हुई। इस अवस्था में मलेरिया, डेंगू और अन्य बुखार जैसी बीमारियाँ तेजी से पनप रही हैं, और जनता प्रशासनिक लापरवाही की राजनीति की कीमत चुका रही है। नीमच का मौजूदा स्वास्थ्य संकट सिर्फ मौसम की मार नहीं है, बल्कि प्रशासन और स्थानीय निकायों की उदासीनता का प्रदर्शित प्रमाण है। डेंगू, मलेरिया और अन्य मौसमी बीमारियों के बढ़ते मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जिम्मेदार विभागों ने समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए।
वैसे भी सितंबर का महीना नीमच जिले में मानसूनी मौसम का चरम होता है। अगस्त-सितंबर में हुई वर्षा से वातावरण में नमी बढ़ जाती है, तापमान दिन में कम और रात में अपेक्षाकृत ठंडा महसूस होता है। इस मौसमी स्थिति में बीमारियों का प्रसार आसान हो जाता है। खासकर जलजनित, वायुजनित तथा कीट जनित रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। नीमच में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उपलब्ध सामान्य जानकारी से साबित होता है कि जिले के अस्पतालों की नर्सरी और एसएनसीयू जैसी इकाइयों में शिशुओं की मृत्यु दर चिंताजनक रही है, जहाँ एक वर्ष में 252 बच्चों की मौत हुई है। इन मौतों के कारणों में सेप्टीसिमिया (रक्त विषाणुता), निमोनिया, डायरीया इत्यादि शामिल हैं।
सबसे पहला प्रश्न उठता है कि क्या स्थानीय निकाय और नगर पालिका, नगर परिषद और ग्राम पंचायतें ऐसी खुली ज़मीनों की नियमित देखरेख कर रही हैं..? क्योंकि अब तक की खबरों के अनुसार ऐसे खुला प्लॉट, वेड-जंगली एवं कूड़े–करकट से भरे स्थान, मच्छरों के पनपने के लिए स्वर्ग बने हुए हैं। प्रशासन के पास पावर है, भूखंड—स्वामियों को नोटिस जारी करने का, कार्रवाई करने का, लेकिन आलोचना यह है कि नोटिसों के बाद ठोस कार्रवाई नहीं होती। फिलहाल केवल कागज़ों में ही काम हो रहा है। दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। नीमच सहित जिले के कई क्षेत्र ‘मलेरिया सर्वेक्षण’ के दायरे से बाहर दिखते हैं। जब बीमारी नियंत्रण प्रणाली, संक्रमण की निगरानी घटाएँ या धीरे हो जाए, तो मरीजों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ती है। अस्पतालों में मरीजों की भीड़, डॉक्टरों की कमी, दवाइयों का अभाव, ये सभी संयोजन एक खतरनाक स्थिति बनाते हैं।
देखा जा रह है कि शहर और गांवों में पंचायत मुख्यालयों तक साफ-सफाई की स्थिति चिन्ताजनक है। वर्षा से पहले ढ़ेरों काम बचे रहते हैं—नालियों की सफाई, जलजमाव जहाँ–जहाँ हो रहा हो वहाँ का तुरंत निस्तारण। लेकिन अधिकारियों की सूझ–बूझ अक्सर इस एक्शन की शुरुआत से ही कम पड़ जाती है। जनप्रतिनिधियों और राजनैतिक प्रभुत्व वाले स्वामी खुले प्लॉट छोड़ देते हैं, प्रशासन बहाना खोजता है कि “स्वामी प्रभावी है” या “जिम्मेदार नहीं मिल रहे”। इस तरह, जनता प्रभावित होती है—बच्चे संक्रमित होते हैं, आर्थिक बोझ बढ़ता है। प्रशासन के लिए यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, एक नैतिक परीक्षण है। सरकारी तंत्र का काम सिर्फ फैसले लेना नहीं है, उन्हें अमल में लाना है। हर वार्ड में नियमित निरीक्षण हों, साप्ताहिक स्तर पर एंटी-लार्वा मीटिंग की जाए, जलभराव को बंद करने के ठोस उपाय हों, और यदि आवश्यकता हो तो कानूनी कार्रवाई हो। साथ ही, जनता को भी संवेदनशील होना चाहिए—स्वयं की जिम्मेदारी और साफ-सफाई की पहल करनी चाहिए।
नीमच की जनता अब और दोषारोपण नहीं सुनना चाहती, वह चाहती है कि प्रशासन बहु‑स्तर पर काम करे—मच्छर नियंत्रण, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और पारदर्शी कार्रवाई। मौसमी बीमारियाँ कोई प्राकृतिक आपदा नहीं हैं जिन्हें टाला न जा सके; ये हमारी भूलों और असावधानियों के पैमाने हैं। समय रहते जागो, नीमच! समय रहते काम करो!