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भारत क्या है और उसकी विरासत क्या है? इसके मूल में जो प्रमाण मिलते हैं, वे उसका एक दर्शन है। यह दर्शन मात्र कुछ वर्षों का कार्य नहीं, बल्कि एक लम्बी साधना के बाद निकला है। जो भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायी है। लम्बे समय से इस आदर्श विरासत को मिटाने का कुचक्र भी चल रहा है। हम यह भली भांति जानते हैं कि जब-जब भारतीय समाज विघटित हुआ है, तब भारत को कमजोर करने के सुनियोजित प्रयास भी किए गए। इतिहास साक्षी है कि बाहरी ताकतों ने भारत के समाज में फूट डालकर अपने मंसूबों को सफल किया, ऐसे प्रयास आज भी हो रहे हैं। मूल समस्या पर किसी प्रकार का कोई चिंतन नहीं हो रहा है, और न ही उस दिशा में कोई प्रयास हो रहा है। भारत में स्वार्थी राजनीति का खेल वैसे तो बहुत पुराना है, लेकिन ऐसी राजनीति जनमानस को केवल भ्रमित करने का काम ही करती है। यह भी सत्य है कि इसका प्रभाव लम्बे समय तक नहीं रहता। राजनीति सत्य की होना चाहिए, न कि झूंठ की। आज विसंगति यह है कि राजनीतिक दल केवल अपने लिए ही राजनीति करते हैं, देश के लिए नहीं। हालत यह है कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करने तक सीमित हो गया है। ऐसी ही राजनीति के माध्यम से हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी स्थापित करने का खेल खेला गया। अब इस षड्यंत्र की परतें भी उधड़ने लगी हैं। जिसके फलस्वरूप फेक नैरेटिव का पर्दाफाश हो गया।अभी-अभी न्यायालय ने मालेगांव विस्फोट मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है। जिसमें हिन्दू आतंकवाद के नैरेटिव को ध्वस्त किया गया। इस नैरेटिव की भूमिका पूरी तरह से आधारहीन ही थी। मालेगाँव विस्फोट मामले में षड्यंत्र की बुनियाद किसने की, इस सवाल का उत्तर पहले से वातावरण में तैर रहा था। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने हिन्दू आतंकवाद की झूठी कहानी की पटकथा तैयार की। बहरहाल, न्यायालय के निर्णय से यह ज्ञात हुआ कि इसमें जिनको आरोपी बनाया गया, उनके विरोध में पर्याप्त प्रमाण नहीं थे। जब प्रमाण ही नहीं थे, तब इस मामले में गिरफ्तार करने की जल्दबाजी किसके संकेत पर की गई..? यह बहुत बड़ा षड़यंत्र ही था, जिसकी कलई धीरे धीरे खुलने लगी हैं। एक पूर्व अधिकारी का बयान इसकी पुष्टि करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। हिन्दू समाज को बदनाम करने का यह षड्यंत्र केवल एक वर्ग को खुश करने प्रयास मात्र ही था। राजनीतिक दलों को हमेशा अपने स्वार्थ के लिए ही राजनीति नहीं करना चाहिए। राजनीति मात्र देश को शक्तिशाली और समाज को संगठित करने के लिए होना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि, क्या देश के लिए काम करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की ही होती है? विपक्ष की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। अगर सभी एक भाव से समाज को एक करने का कार्य करें तो भारत का सूर्य केवल भारत को ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को आलोकित करेगा, इसमें कोई संकोच नहीं। अब सवाल यह उठता है कि रामराज्य की संकल्पना को ज़मीन पर उतारने का सपना देखने वाले महात्मा गांधी के नाम पर राजनीति करने वाली कांग्रेस के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसने हिन्दू आतंकवाद का प्रपंच रचा? ऐसी राजनीति करने वाले एक प्रकार से कांग्रेस को ही कमजोर करने का काम कर रहे हैं..! वैसे भी यह भुलाया नहीं जा सकता है कि एक बार कांग्रेस की सरकार के समय भगवान श्री राम के अस्तित्व को नकारने का भी प्रयास किया गया। उस समय हिन्दू समाज की जाग्रति के समक्ष कांग्रेस को झुकना पड़ा और सरकारी स्तर पर किए गए प्रयास पर पूरी तरह से पानी फिर गया। मालेगाँव विस्फोट मामले में भी ऐसा ही प्रयास किया गया। इसका एक कारण कांग्रेस की वह मानसिकता है, जिसके तहत कांग्रेस को नेतृत्व देने वाले राजनेता केवल यही सोचते हैं कि हम तो सरकार चलाने के लिए ही बने हैं। आज भी कांग्रेस के नेता इसी भावना के साथ विचार रखते हैं। उन्हें यह लगता ही नहीं है कि देश में अब कांग्रेस की सरकार नहीं है और देश में राजनीतिक परिवर्तन हो चुका है। कांग्रेस को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि देश की जनता क्या चाहती है। क्योंकि जनता ने ही कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया है। भारत का लोकतंत्र यही कहता है कि देश में जनता का शासन है। जनता का शासन मतलब किसी दल की सरकार नहीं, वह जनता की सरकार है, लेकिन हमारे राजनीतिक दल इसको राजनीतिक दल की सरकार मानकर व्यवहार करते हैं। कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि जब जनता की सरकार है, तब सरकार का विरोध करने का अर्थ जनता का ही विरोध है। आज जनता इतनी समझदार हो चुकी है कि उसे पल पल की जानकारी है, इसलिए कुछ समय के भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन भ्रम से जब परदा उठता है तो इसके पीछे एक षड्यंत्र का खेल दिखाई देता है। मालेगांव मामले में कुछ बयानों को आधार बनाया जाए तो यही कहा जा सकता है कि इसमें और भी प्रभावी व्यक्तियों को फसाने की तैयारी भी हो रही थी, इसकी भूमिका भी बन चुकी थी, लेकिन कांग्रेस का यह सपना इसलिए पूरा नहीं हो सका, क्योंकि जिनको आरोपी बनाया गया, उन्होंने प्रताड़ना सहने के बाद भी उनके मन मुताबिक बयान नहीं दिए। यहां एक और बात का उल्लेख करना बहुत आवश्यक हो जाता है कि कांग्रेस के नेता असली आतंकवाद पर बोलने से हमेशा किनारा करते हैं। इतना ही नहीं कभी कभी तो कांग्रेस के नेता आतंकियों के समर्थन में सम्मान पूर्वक बात करते हैं। इनको केवल सनातन से चिड़ है। आज जब सनातन अपने उभार पर है, तब इनकी चिंता और ज्यादा बढ़ रही है। भारत में राजनीति की दशा और दिशा क्या होना चाहिए, यह तय करने का समय आ गया है। कांग्रेस को इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
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भारत क्या है और उसकी विरासत क्या है? इसके मूल में जो प्रमाण मिलते हैं, वे उसका एक दर्शन है। यह दर्शन मात्र कुछ वर्षों का कार्य नहीं, बल्कि एक लम्बी साधना के बाद निकला है। जो भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायी है। लम्बे समय से इस आदर्श विरासत को मिटाने का कुचक्र भी चल रहा है। हम यह भली भांति जानते हैं कि जब-जब भारतीय समाज विघटित हुआ है, तब भारत को कमजोर करने के सुनियोजित प्रयास भी किए गए। इतिहास साक्षी है कि बाहरी ताकतों ने भारत के समाज में फूट डालकर अपने मंसूबों को सफल किया, ऐसे प्रयास आज भी हो रहे हैं। मूल समस्या पर किसी प्रकार का कोई चिंतन नहीं हो रहा है, और न ही उस दिशा में कोई प्रयास हो रहा है। भारत में स्वार्थी राजनीति का खेल वैसे तो बहुत पुराना है, लेकिन ऐसी राजनीति जनमानस को केवल भ्रमित करने का काम ही करती है। यह भी सत्य है कि इसका प्रभाव लम्बे समय तक नहीं रहता। राजनीति सत्य की होना चाहिए, न कि झूंठ की। आज विसंगति यह है कि राजनीतिक दल केवल अपने लिए ही राजनीति करते हैं, देश के लिए नहीं। हालत यह है कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करने तक सीमित हो गया है। ऐसी ही राजनीति के माध्यम से हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी स्थापित करने का खेल खेला गया। अब इस षड्यंत्र की परतें भी उधड़ने लगी हैं। जिसके फलस्वरूप फेक नैरेटिव का पर्दाफाश हो गया।अभी-अभी न्यायालय ने मालेगांव विस्फोट मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है। जिसमें हिन्दू आतंकवाद के नैरेटिव को ध्वस्त किया गया। इस नैरेटिव की भूमिका पूरी तरह से आधारहीन ही थी। मालेगाँव विस्फोट मामले में षड्यंत्र की बुनियाद किसने की, इस सवाल का उत्तर पहले से वातावरण में तैर रहा था। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने हिन्दू आतंकवाद की झूठी कहानी की पटकथा तैयार की। बहरहाल, न्यायालय के निर्णय से यह ज्ञात हुआ कि इसमें जिनको आरोपी बनाया गया, उनके विरोध में पर्याप्त प्रमाण नहीं थे। जब प्रमाण ही नहीं थे, तब इस मामले में गिरफ्तार करने की जल्दबाजी किसके संकेत पर की गई..? यह बहुत बड़ा षड़यंत्र ही था, जिसकी कलई धीरे धीरे खुलने लगी हैं। एक पूर्व अधिकारी का बयान इसकी पुष्टि करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। हिन्दू समाज को बदनाम करने का यह षड्यंत्र केवल एक वर्ग को खुश करने प्रयास मात्र ही था। राजनीतिक दलों को हमेशा अपने स्वार्थ के लिए ही राजनीति नहीं करना चाहिए। राजनीति मात्र देश को शक्तिशाली और समाज को संगठित करने के लिए होना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि, क्या देश के लिए काम करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की ही होती है? विपक्ष की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। अगर सभी एक भाव से समाज को एक करने का कार्य करें तो भारत का सूर्य केवल भारत को ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को आलोकित करेगा, इसमें कोई संकोच नहीं। अब सवाल यह उठता है कि रामराज्य की संकल्पना को ज़मीन पर उतारने का सपना देखने वाले महात्मा गांधी के नाम पर राजनीति करने वाली कांग्रेस के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसने हिन्दू आतंकवाद का प्रपंच रचा? ऐसी राजनीति करने वाले एक प्रकार से कांग्रेस को ही कमजोर करने का काम कर रहे हैं..! वैसे भी यह भुलाया नहीं जा सकता है कि एक बार कांग्रेस की सरकार के समय भगवान श्री राम के अस्तित्व को नकारने का भी प्रयास किया गया। उस समय हिन्दू समाज की जाग्रति के समक्ष कांग्रेस को झुकना पड़ा और सरकारी स्तर पर किए गए प्रयास पर पूरी तरह से पानी फिर गया। मालेगाँव विस्फोट मामले में भी ऐसा ही प्रयास किया गया। इसका एक कारण कांग्रेस की वह मानसिकता है, जिसके तहत कांग्रेस को नेतृत्व देने वाले राजनेता केवल यही सोचते हैं कि हम तो सरकार चलाने के लिए ही बने हैं। आज भी कांग्रेस के नेता इसी भावना के साथ विचार रखते हैं। उन्हें यह लगता ही नहीं है कि देश में अब कांग्रेस की सरकार नहीं है और देश में राजनीतिक परिवर्तन हो चुका है। कांग्रेस को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि देश की जनता क्या चाहती है। क्योंकि जनता ने ही कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया है। भारत का लोकतंत्र यही कहता है कि देश में जनता का शासन है। जनता का शासन मतलब किसी दल की सरकार नहीं, वह जनता की सरकार है, लेकिन हमारे राजनीतिक दल इसको राजनीतिक दल की सरकार मानकर व्यवहार करते हैं। कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि जब जनता की सरकार है, तब सरकार का विरोध करने का अर्थ जनता का ही विरोध है। आज जनता इतनी समझदार हो चुकी है कि उसे पल पल की जानकारी है, इसलिए कुछ समय के भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन भ्रम से जब परदा उठता है तो इसके पीछे एक षड्यंत्र का खेल दिखाई देता है। मालेगांव मामले में कुछ बयानों को आधार बनाया जाए तो यही कहा जा सकता है कि इसमें और भी प्रभावी व्यक्तियों को फसाने की तैयारी भी हो रही थी, इसकी भूमिका भी बन चुकी थी, लेकिन कांग्रेस का यह सपना इसलिए पूरा नहीं हो सका, क्योंकि जिनको आरोपी बनाया गया, उन्होंने प्रताड़ना सहने के बाद भी उनके मन मुताबिक बयान नहीं दिए। यहां एक और बात का उल्लेख करना बहुत आवश्यक हो जाता है कि कांग्रेस के नेता असली आतंकवाद पर बोलने से हमेशा किनारा करते हैं। इतना ही नहीं कभी कभी तो कांग्रेस के नेता आतंकियों के समर्थन में सम्मान पूर्वक बात करते हैं। इनको केवल सनातन से चिड़ है। आज जब सनातन अपने उभार पर है, तब इनकी चिंता और ज्यादा बढ़ रही है। भारत में राजनीति की दशा और दिशा क्या होना चाहिए, यह तय करने का समय आ गया है। कांग्रेस को इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
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