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नीमच और आसपास का क्षेत्र आज चौराहे पर खड़ा है। एक ओर परंपरागत अफीम की वैध खेती, दूसरी ओर अवैध डोडा चूरा और सिंथेटिक नशे का काला कारोबार। सवाल यह है कि क्या हम अपने युवाओं को नशे के दलदल में जाने देंगे, या मिलकर एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज बनाएंगे? कार्रवाई की रफ्तार जितनी तेज हो, उतना बेहतर है, लेकिन असली जीत तब होगी जब नशे की मांग ही खत्म कर दी जाए। इसके लिए समाज, सरकार और कानून—तीनों को मिलकर निर्णायक कदम उठाने होंगे। दरअसल, नीमच एक बार फिर सुर्खियों में है। कभी लग्जरी कारों से, तो कभी आलू-प्याज की बोरियों के नीचे छुपाकर डोडा चूरा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी की जा रही है। पुलिस और केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) हर दूसरे दिन बड़ी कार्रवाई कर रहे हैं। बीते तीन दिनों में ही पांच से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। यह साफ संकेत है कि जिले में नशे का कारोबार सिर्फ फल-फूल ही नहीं रहा, बल्कि संगठित और तकनीकी तौर पर और ज्यादा खतरनाक रूप ले चुका है।
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नीमच और आसपास का क्षेत्र आज चौराहे पर खड़ा है। एक ओर परंपरागत अफीम की वैध खेती, दूसरी ओर अवैध डोडा चूरा और सिंथेटिक नशे का काला कारोबार। सवाल यह है कि क्या हम अपने युवाओं को नशे के दलदल में जाने देंगे, या मिलकर एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज बनाएंगे? कार्रवाई की रफ्तार जितनी तेज हो, उतना बेहतर है, लेकिन असली जीत तब होगी जब नशे की मांग ही खत्म कर दी जाए। इसके लिए समाज, सरकार और कानून—तीनों को मिलकर निर्णायक कदम उठाने होंगे।
दरअसल, नीमच एक बार फिर सुर्खियों में है। कभी लग्जरी कारों से, तो कभी आलू-प्याज की बोरियों के नीचे छुपाकर डोडा चूरा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी की जा रही है। पुलिस और केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) हर दूसरे दिन बड़ी कार्रवाई कर रहे हैं। बीते तीन दिनों में ही पांच से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। यह साफ संकेत है कि जिले में नशे का कारोबार सिर्फ फल-फूल ही नहीं रहा, बल्कि संगठित और तकनीकी तौर पर और ज्यादा खतरनाक रूप ले चुका है।
नीमच, मंदसौर, चित्तौड़गढ़ और आसपास के क्षेत्र अफीम की लाइसेंसी खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। किसानों को केंद्र सरकार अफीम की खेती का लाइसेंस देती है, लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। नई अफीम नीति 2025-26 घोषित हो चुकी है, फिर भी चीरा पद्धति से होने वाली खेती से प्राप्त पॉपीस्ट्रॉ यानी डोडा चूरा की खरीदी का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। जब तक सरकार किसानों से पारदर्शी और सुनिश्चित खरीदी नहीं करेगी, तब तक डोडा चूरा का अवैध बाजार खत्म होना मुश्किल है। किसान की उपज का रास्ता बंद होता है, तो तस्करों का रास्ता खुल जाता है।
आज समस्या केवल डोडा चूरा तक सीमित नहीं है। शहर और गांवों में एमडीएमए, स्मैक, ब्राउन शुगर, और सिंथेटिक ड्रग्स की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। यह नशे का नया और खतरनाक चेहरा है, जो युवाओं को अपराध की ओर धकेल रहा है। आंकड़े बताते हैं कि तस्कर अब स्थानीय युवाओं को ही वितरण की श्रृंखला में शामिल कर रहे हैं। नशे का लालच, आसान कमाई और बेरोजगारी—यह तीनों मिलकर एक ऐसा दुष्चक्र बना रहे हैं, जिससे निकलना कठिन है।
सवाल यह है कि जब पुलिस और सीबीएन हर रोज कार्रवाई कर रहे हैं, तो फिर भी तस्करी क्यों नहीं रुक रही? वजह साफ है—नशे का नेटवर्क बहुत गहरा और बहुस्तरीय है। छोटे-छोटे पकड़ाए जाने वाले मामले सिर्फ सतह को खुरचने भर के समान हैं। असली सरगना अक्सर कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं। इनकी जड़ों तक पहुंचने के लिए खुफिया नेटवर्क मजबूत करना होगा, सीमा पर निगरानी बढ़ानी होगी और अदालतों में तेज सुनवाई सुनिश्चित करनी होगी।
नशे के कारोबार को रोकने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है। जब तक समाज खुद आगे नहीं आएगा, तब तक यह समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। युवाओं को खेल, शिक्षा और रोजगार की ओर आकर्षित करना सबसे बड़ी जरूरत है। गांव-गांव और मोहल्लों में नशा मुक्ति अभियान सिर्फ औपचारिकता न रह जाए, इसके लिए निरंतर गतिविधियां चलानी होंगी। स्कूल और कॉलेज स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम, पुनर्वास केंद्र और परिवारों की भूमिका बेहद अहम है।
इसके अलावा अफीम नीति में सुधार होना चाहिये। किसानों से डोडा चूरा की खरीदी का स्पष्ट और सख्त प्रावधान होना चाहिए। ऑनलाइन और केमिकल आधारित नशे पर रोक लगाने के लिए फार्मा कंपनियों की सप्लाई चेन पर सख्त निगरानी जरूरी है। बेरोजगारी और निराशा नशे की ओर पहला कदम है। सरकार को युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास योजनाओं को और कारगर बनाना होगा। नशा तस्करी के मामलों में लंबी सुनवाई तस्करों को और ताकत देती है। विशेष अदालतें इस प्रक्रिया को तेज कर सकती हैं।