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भारतीय कालगणना की परंपरा में विक्रम संवत का विशेष स्थान है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला यह संवत भारतीय संस्कृति में नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यही तिथि हिन्दू नववर्ष के रूप में मनाई जाती है। इस संवत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान उस नगर से भी जुड़ी हुई है जिसने प्राचीन भारत में समय गणना और खगोल अध्ययन को दिशा दी और वह है भारत का प्राचीनतम नगर उज्जैन।
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भारतीय कालगणना की परंपरा में विक्रम संवत का विशेष स्थान है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला यह संवत भारतीय संस्कृति में नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यही तिथि हिन्दू नववर्ष के रूप में मनाई जाती है। इस संवत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान उस नगर से भी जुड़ी हुई है जिसने प्राचीन भारत में समय गणना और खगोल अध्ययन को दिशा दी और वह है भारत का प्राचीनतम नगर उज्जैन।
प्राचीन भारत में उज्जैन केवल एक राजनीतिक केंद्र नहीं था, बल्कि खगोलशास्त्र, ज्योतिष और पंचांग निर्माण का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। इसलिए विक्रम संवत और उज्जैन का संबंध भारतीय इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
*सम्राट विक्रमादित्य और विक्रम संवत*
भारतीय परंपरा के अनुसार विक्रम संवत की स्थापना महान शासक सम्राट विक्रमादित्य ने की थी। मान्यता है कि उन्होंने 57 ईसा पूर्व शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद इस संवत की शुरुआत की। इस विजय को स्मरणीय बनाने के लिए एक नई कालगणना पद्धति प्रारंभ की गई, जो आगे चलकर विक्रम संवत के नाम से प्रसिद्ध हुई।
सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन मानी जाती है। उस समय यह नगर मध्य भारत का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र था। इसी नगर से विक्रम संवत की कालगणना का प्रसार हुआ और धीरे-धीरे यह पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में व्यापक रूप से प्रचलित हो गया।
*उज्जैन : प्राचीन भारत का समय केंद्र*
प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में उज्जैन को समय और खगोलीय गणनाओं का केंद्र माना गया। अनेक विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों ने अपनी गणनाओं का आधार इसी नगर को बनाया। भारतीय ज्योतिष की परंपरा में यह मान्यता रही कि पृथ्वी की गणनात्मक मध्य रेखा (कर्क रेखा) उज्जैन से होकर गुजरती है। इसी कारण ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, पंचांग निर्माण और समय की गणना में उज्जैन को आधार माना गया। बाद के काल में भी यहां खगोल अध्ययन की परंपरा जारी रही और वेधशालाओं की स्थापना के माध्यम से खगोलीय अध्ययन को आगे बढ़ाया गया।
*हिन्दू नववर्ष और धार्मिक महत्व*
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल विक्रम संवत का पहला दिन ही नहीं है, बल्कि यह तिथि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पुराणों के अनुसार इसी दिन सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी।
इसी तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है। नवरात्रि के ये नौ दिन देवी दुर्गा की आराधना और भक्ति का विशेष पर्व माने जाते हैं। इस दौरान भक्त दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं और घरों तथा मंदिरों में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
हिन्दू नववर्ष केवल एक कैलेंडर का आरंभ नहीं बल्कि भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा के नौ दिवसीय उत्सव की शुरुआत भी है।
*प्रकृति के साथ जुड़ा नववर्ष*
भारतीय संस्कृति में समय की गणना प्रकृति के चक्र से जुड़ी रही है। चैत्र मास में वसंत ऋतु अपने चरम पर होती है। वृक्षों पर नई पत्तियां आती हैं, फूल खिलते हैं और खेतों में फसल पकने लगती है। इस कारण भारतीय मनीषियों ने नए वर्ष की शुरुआत को ऐसे समय से जोड़ा जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का संकेत दे रही होती है। यह व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि भारतीय कालगणना केवल धार्मिक आस्था नहीं बल्कि प्रकृति की गहरी समझ पर आधारित थी।
*गुड़ी पड़वा और विजय ध्वज की परंपरा*
महाराष्ट्र में हिन्दू नववर्ष को गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन घरों के बाहर एक विशेष ध्वज जैसा प्रतीक लगाया जाता है जिसे गुड़ी कहा जाता है।
गुड़ी एक लंबी लकड़ी या बांस पर रंगीन वस्त्र बांधकर बनाई जाती है। उसके ऊपर तांबे या चांदी का कलश उल्टा रखा जाता है और उसे नीम तथा आम के पत्तों से सजाया जाता है।
गुड़ी को विजय और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कुछ परंपराओं में इसे सम्राट विक्रमादित्य की विजय से जोड़ा जाता है, जबकि कुछ मान्यताओं में इसे भगवान राम के राज्याभिषेक की स्मृति का प्रतीक माना जाता है।
*देश के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष*
भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण हिन्दू नववर्ष अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।
आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में इसे उगादी कहा जाता है।
कश्मीर के पंडित समुदाय में यह पर्व नवरेह के रूप में मनाया जाता है। सिंधी समाज में यह पर्व चेतीचंड के रूप में मनाया जाता है, जो उनके आराध्य देव झूलेलाल से जुड़ा हुआ है।
*भारतीय समाज में विक्रम संवत की परंपरा*
आज भले ही सरकारी और प्रशासनिक कार्यों में ग्रेगोरियन कैलेंडर का उपयोग किया जाता हो, लेकिन भारतीय समाज के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विक्रम संवत का महत्व आज भी बना हुआ है।
विवाह, गृहप्रवेश, नामकरण, यज्ञ और अन्य संस्कारों की तिथियां आज भी हिंदू पंचांग के आधार पर निर्धारित की जाती हैं। कई व्यापारी समुदाय भी अपने नए लेखा-वर्ष की शुरुआत इसी समय से करते हैं।
भारतीय जनमानस में विक्रम संवत केवल एक कालगणना प्रणाली नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास की निरंतरता का प्रतीक है और इस परंपरा की ऐतिहासिक धुरी के रूप में उज्जैन का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। *(विनायक फीचर्स)*