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भोपाल: 7 सितम्बर को छिंदवाड़ा के न्यूटन चिखली गांव में 5 वर्ष 8 महीने के अदनान की मौत हो जाती है. छिंदवाड़ा सिरप मामले में ये पहली मौत थी. सरकार को इस मौत के साथ ही चेत जाना था. लेकिन वजह तक पहुंचने और दवा पर बैन लगाने में भी 22 दिन लग गए. 22 दिन बाद भी केवल छिंदवाड़ा में बैन लगा. इस दौरान भी धड़ल्ले से बच्चों को जानलेवा कफ सिरप पिलाई जाती रही. सिरप ने ली अब तक 10 बच्चों की जानइसका नतीजा ये निकला कि 6 और बच्चों की मौत हो गई. अब जब ड्रग कंट्रोलर की रिपोर्ट में साफ हो गया कि दवा ही जहर बन गई. रिपोर्ट बता रही है कि सिरप में 48.6 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकोल मिला हुआ था. रिपोर्ट के मुताबिक जो कि एक जहरीला पदार्थ है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. ये सच्चाई सामने आने तक बच्चों की मौत का आंकड़ा 10 तक पहुंच गया है.
अब तक 10 बच्चों की सिरप ने ली जान (ETV Bharat) अभी भी जिंदगी-मौत से लड़ रहे हैं 6 बच्चेक्या छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत के मामले में अगर सजगता दिखाई होती तो क्या ये मौतें रोकी नहीं जा सकती थी. सवाल कईं हैं और स्वास्थ्य मंत्री के उस बयान पर सियासत भी है, जिसमें उन्होंने पहले कफ सिरप को क्लीन चिट दे दी थी. इस खबर को लिखे जाने के दौरान किडनी फेल होने से एक बच्ची की और मौत हो गई है. नागपुर में पिछले एक सप्ताह से जिंदगी मौत से जूझ रही योगिता ठाकरे ये जंग हार गई. जिससे अब यह आंकड़ा 10 तक पहुंच गया है. योगिता परासिया बड़कुही गांव की रहने वाली थी. अभी 6 बच्चे और जिंदगी मौत से लड़ रहे हैं. 4 वेंटीलेटर पर हैं और 2 की डायलिसिस चल रही है. 22 दिन बाद सिरप पर लगा बैनछिंदवाड़ा में बच्चों की मौत का सिलसिला 7 सितंबर से शुरू हुआ था. बीती 3 अक्टूबर तक ये सिलसिला जारी रहा. क्या बच्चों की मौत समय रहते संभाली नहीं जा सकती थी. सवाल ये कि दूसरी तीसरी मौत के बाद प्रशासन ने सख्ती से जांच क्यों नहीं की. 12 महीने से लेकर 5 वर्ष तक के बच्चे इस सिरप से प्रभावित हुए और इन 27 दिनों में मासूमों की मौत का आंकड़ा बढ़ता रहा. लेकिन जिस तेजी से एक्शन होना चाहिए था. उसमें भारी ढिलाई थी. 22 दिन बाद तो उस दवा पर बैन लग पाया, जिस दवा की जांच के नतीजे ये बता रहे हैं कि दवा के रूप में वो जहर थी. जिस सीरप से जान गई उसे दे दी गई क्लीन चिट!यह बैन भी अकेले छिंदवाड़ा में लगा बाकी जगह ये दवा बेची जा रही थी. हैरत ये भी है कि खुद स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने जांच रिपोर्ट आने से पहले इस दवा को क्लीन चिट दे दी थी. कांग्रेस अब इसको मुद्दा बना रही है. स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने इस मामले में दिए गए अपने बयान में कहा था कि "कफ सिरप को इन मौतों को वजह बनाना इस तरह का आरोप पूरी तरह से निराधार है. कफ सिरप के कारण ये मौतें नहीं हुई हैं ये तय है." हालांकि बाद में मंत्री अपने बयान से पलट गए और उन्होने कहा कि "जब जांच रिपोर्ट आएगी उसके बाद ही ये स्पष्ट हो सकेगा कि बच्चों की मौत की वजह क्या है." उन्होंने कहा था कि पूरा स्वास्थ्य विभाग का अमला स्थिति पर नजर रखे हुए है.
कांग्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री को घेरा इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने कहा है कि "सरकार को शर्म आनी चाहिए कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री खुद जांच रिपोर्ट आने से पहले उस जहर भरी कफ सिरप को क्लीन चिट दे रहे थे. जिन पर उन मासूमों की जिंदगी बचाने की जवाबदारी थी. वो मौत देने वाली सिरप कंपनी की तरफदारी में खड़े थे. वे ये तक कह गए थे कि सिरप से मौतें नहीं हुईं ये तय है." 10 मौतें होने के बाद दवा में मिले जहर की रिपोर्ट आई7 सितम्बर से मौतें शुरू हुई लेकिन रिपोर्ट आते आते 4 अक्टूबर हो गई. जब मीडिया के दबाव में सिस्टम जागा तब तक मौतों का आंकड़ा 10 तक पहुंच चुका था. तमिलनाडु और राजस्थान मध्य प्रदेश से इस मामले में आगे रहे. आज जांच रिपोर्ट आते ही मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने पूरे प्रदेश में कफ सिरप कोल्ड्रिफ पर प्रतिबंध लगा दिया. उन्होंने ये भी कहा कि "इस कंपनी के बाकी प्रोडक्ट पर भी बैन लगा दिया गया है." सिरप निर्माता कंपनी के बाकी प्रोडक्ट बिक्री पर रोककंट्रोलर फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट कहती है, कफ सिरप कोल्ड्रिफ पर प्रतिबंध लगाया गया है. वो मिलावटी है. इस जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि इस सिरप मे 48.6 फीसदी डायथिलीन ग्लाइकोल मिला हुआ है, जो किसी के भी सेहत के लिए बेहद हानिकारक है. जांच रिपोर्ट में ये कहा गया है कि अगर ये दवा कहीं उपलब्ध होती है तो तुरंत जरूरी एक्शन लिया जाए. इसकी बिक्री पर तत्काल रोक लगे और अगर कोई बेचता पाया जाता है तो उसे कानून के दायरे में लाया जाए. इसी तरह से इस कफ सिरप की निर्माता कंपनी सिरीसन फार्मास्युटिकल के बाकी प्रोडक्ट की खरीदी और वितरण भी तत्काल प्रभाव से रोका जाए. वोटर नहीं थे तो क्या उन मासूमों की जान कीमती नहीं?5 साल से लेकर 18 महीने के मासूम बच्चे इस सिरप के चपेट में आए हैं. उस उम्र के बच्चों को लेकर माता पिता की जान बच्चों में अटकी होती है. कमजोर तबके के परिवारों ने जिंदगी बचाने की पूरी कोशिश की. सब दांव पर लगा दिया. छिंदवाड़ा में ही जिस डॉक्टर प्रवीन सोनी ने इन्हें ये दवा लिखी. माता पिता तो उनके पास भी बच्चों के ठीक हो जाने की आस लेकर गए होंगे. इस बात से पूरी तरह बेखबर कि दवा ही जहर बन जाएगी. 10 बच्चे खिलने से पहले मुरझा चुके हैं. 4 वेंटीलेटर पर अब भी लड़ रहे हैं जिंदगी के लिए और 2 की डायलिसिस चल रही है. |
भोपाल: 7 सितम्बर को छिंदवाड़ा के न्यूटन चिखली गांव में 5 वर्ष 8 महीने के अदनान की मौत हो जाती है. छिंदवाड़ा सिरप मामले में ये पहली मौत थी. सरकार को इस मौत के साथ ही चेत जाना था. लेकिन वजह तक पहुंचने और दवा पर बैन लगाने में भी 22 दिन लग गए. 22 दिन बाद भी केवल छिंदवाड़ा में बैन लगा. इस दौरान भी धड़ल्ले से बच्चों को जानलेवा कफ सिरप पिलाई जाती रही.
इसका नतीजा ये निकला कि 6 और बच्चों की मौत हो गई. अब जब ड्रग कंट्रोलर की रिपोर्ट में साफ हो गया कि दवा ही जहर बन गई. रिपोर्ट बता रही है कि सिरप में 48.6 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकोल मिला हुआ था. रिपोर्ट के मुताबिक जो कि एक जहरीला पदार्थ है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. ये सच्चाई सामने आने तक बच्चों की मौत का आंकड़ा 10 तक पहुंच गया है.
अब तक 10 बच्चों की सिरप ने ली जान (ETV Bharat)
क्या छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत के मामले में अगर सजगता दिखाई होती तो क्या ये मौतें रोकी नहीं जा सकती थी. सवाल कईं हैं और स्वास्थ्य मंत्री के उस बयान पर सियासत भी है, जिसमें उन्होंने पहले कफ सिरप को क्लीन चिट दे दी थी. इस खबर को लिखे जाने के दौरान किडनी फेल होने से एक बच्ची की और मौत हो गई है. नागपुर में पिछले एक सप्ताह से जिंदगी मौत से जूझ रही योगिता ठाकरे ये जंग हार गई. जिससे अब यह आंकड़ा 10 तक पहुंच गया है. योगिता परासिया बड़कुही गांव की रहने वाली थी. अभी 6 बच्चे और जिंदगी मौत से लड़ रहे हैं. 4 वेंटीलेटर पर हैं और 2 की डायलिसिस चल रही है.
छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत का सिलसिला 7 सितंबर से शुरू हुआ था. बीती 3 अक्टूबर तक ये सिलसिला जारी रहा. क्या बच्चों की मौत समय रहते संभाली नहीं जा सकती थी. सवाल ये कि दूसरी तीसरी मौत के बाद प्रशासन ने सख्ती से जांच क्यों नहीं की. 12 महीने से लेकर 5 वर्ष तक के बच्चे इस सिरप से प्रभावित हुए और इन 27 दिनों में मासूमों की मौत का आंकड़ा बढ़ता रहा. लेकिन जिस तेजी से एक्शन होना चाहिए था. उसमें भारी ढिलाई थी. 22 दिन बाद तो उस दवा पर बैन लग पाया, जिस दवा की जांच के नतीजे ये बता रहे हैं कि दवा के रूप में वो जहर थी.
यह बैन भी अकेले छिंदवाड़ा में लगा बाकी जगह ये दवा बेची जा रही थी. हैरत ये भी है कि खुद स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने जांच रिपोर्ट आने से पहले इस दवा को क्लीन चिट दे दी थी. कांग्रेस अब इसको मुद्दा बना रही है. स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने इस मामले में दिए गए अपने बयान में कहा था कि "कफ सिरप को इन मौतों को वजह बनाना इस तरह का आरोप पूरी तरह से निराधार है. कफ सिरप के कारण ये मौतें नहीं हुई हैं ये तय है."
हालांकि बाद में मंत्री अपने बयान से पलट गए और उन्होने कहा कि "जब जांच रिपोर्ट आएगी उसके बाद ही ये स्पष्ट हो सकेगा कि बच्चों की मौत की वजह क्या है." उन्होंने कहा था कि पूरा स्वास्थ्य विभाग का अमला स्थिति पर नजर रखे हुए है.
कांग्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री को घेरा
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने कहा है कि "सरकार को शर्म आनी चाहिए कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री खुद जांच रिपोर्ट आने से पहले उस जहर भरी कफ सिरप को क्लीन चिट दे रहे थे. जिन पर उन मासूमों की जिंदगी बचाने की जवाबदारी थी. वो मौत देने वाली सिरप कंपनी की तरफदारी में खड़े थे. वे ये तक कह गए थे कि सिरप से मौतें नहीं हुईं ये तय है."
7 सितम्बर से मौतें शुरू हुई लेकिन रिपोर्ट आते आते 4 अक्टूबर हो गई. जब मीडिया के दबाव में सिस्टम जागा तब तक मौतों का आंकड़ा 10 तक पहुंच चुका था. तमिलनाडु और राजस्थान मध्य प्रदेश से इस मामले में आगे रहे. आज जांच रिपोर्ट आते ही मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने पूरे प्रदेश में कफ सिरप कोल्ड्रिफ पर प्रतिबंध लगा दिया. उन्होंने ये भी कहा कि "इस कंपनी के बाकी प्रोडक्ट पर भी बैन लगा दिया गया है."
कंट्रोलर फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट कहती है, कफ सिरप कोल्ड्रिफ पर प्रतिबंध लगाया गया है. वो मिलावटी है. इस जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि इस सिरप मे 48.6 फीसदी डायथिलीन ग्लाइकोल मिला हुआ है, जो किसी के भी सेहत के लिए बेहद हानिकारक है. जांच रिपोर्ट में ये कहा गया है कि अगर ये दवा कहीं उपलब्ध होती है तो तुरंत जरूरी एक्शन लिया जाए. इसकी बिक्री पर तत्काल रोक लगे और अगर कोई बेचता पाया जाता है तो उसे कानून के दायरे में लाया जाए. इसी तरह से इस कफ सिरप की निर्माता कंपनी सिरीसन फार्मास्युटिकल के बाकी प्रोडक्ट की खरीदी और वितरण भी तत्काल प्रभाव से रोका जाए.
5 साल से लेकर 18 महीने के मासूम बच्चे इस सिरप के चपेट में आए हैं. उस उम्र के बच्चों को लेकर माता पिता की जान बच्चों में अटकी होती है. कमजोर तबके के परिवारों ने जिंदगी बचाने की पूरी कोशिश की. सब दांव पर लगा दिया. छिंदवाड़ा में ही जिस डॉक्टर प्रवीन सोनी ने इन्हें ये दवा लिखी. माता पिता तो उनके पास भी बच्चों के ठीक हो जाने की आस लेकर गए होंगे. इस बात से पूरी तरह बेखबर कि दवा ही जहर बन जाएगी. 10 बच्चे खिलने से पहले मुरझा चुके हैं. 4 वेंटीलेटर पर अब भी लड़ रहे हैं जिंदगी के लिए और 2 की डायलिसिस चल रही है.