विश्व बांस दिवस विशेष: बांस की खेती से बदली किसान की पहचान, ‘बैम्बू मैन’ कमलाशंकर ने खड़ा किया जैव विविधता का मॉडल

भाटखेड़ी बुजुर्ग के कमलाशंकर विश्वकर्मा ने बांस की खेती को जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण, प्रशिक्षण, रोजगार और कृषि पर्यटन से जोड़ा दिल्ली की नौकरी छोड़ गांव लौटे
कमलाशंकर विश्वकर्मा ने माइक्रोबायोलॉजी में स्नातक तथा समाज कार्य एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है। खेती में पूर्णकालिक रूप से आने से पहले वे दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्य कर चुके हैं। कोरोना काल के दौरान उन्होंने नौकरी छोड़कर गांव लौटने और कृषि क्षेत्र में नया प्रयोग शुरू करने का निर्णय लिया।
बांस से शुरू हुआ नवाचार
गांव लौटने के बाद उन्होंने करीब एक हेक्टेयर भूमि पर बांस की खेती शुरू की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2020-21 में लगभग 1100 बांस के पौधे लगाए गए। इसके बाद खेत को ‘विश्वकर्मा बैम्बू फार्म एंड बायोडायवर्सिटी पार्क’ और ‘फूड फॉरेस्ट’ के रूप में विकसित किया गया।
खास बात यह है कि यहां बांस के साथ मूंग, उड़द, मूंगफली, मक्का और चिया जैसी फसलों की खेती भी की जाती है। इसके अलावा औषधीय पौधों और प्राकृतिक खेती से जुड़े प्रयोग भी किए जा रहे हैं।
बांस से उत्पाद और कृषि पर्यटन तक
कमलाशंकर ने बांस की खेती को मूल्यवर्धन से भी जोड़ने का प्रयास किया है। उनके फार्म पर बांस से पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार किए जाते हैं। जैविक अनाज, दालें, मसाले और जड़ी-बूटियों के मूल्यवर्धन एवं बिक्री की गतिविधियां भी संचालित की जा रही हैं। फार्म को प्रशिक्षण, जैव विविधता और कृषि पर्यटन से जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
जैव विविधता पर भी जोर
उनके खेत में बांस के साथ औषधीय और अन्य पौधों का संरक्षण किया जा रहा है। मध्यप्रदेश वन विभाग के प्रकाशन में भी भाटखेड़ी के कमलाशंकर विश्वकर्मा के बांस और अंतरवर्ती औषधीय फसलों से जुड़े कार्य का उल्लेख किया गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान
कमलाशंकर विश्वकर्मा को वर्ष 2025 में Professor Rattan Lal Awards for Excellence in Regenerative Agriculture में ‘Progressive Regenerative Farmer’ के रूप में सम्मानित किए जाने की जानकारी उपलब्ध है। उनके फार्म को बांस, औषधीय फसलों और जैव विविधता आधारित खेती के मॉडल के रूप में भी दर्ज किया गया है।
पुरानी बांस कारीगरी को फिर पहचान दिलाने की कोशिश
एक समय ग्रामीण जीवन में बांस की टोकरियां, डलिया और अन्य उपयोगी वस्तुएं आम थीं। प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ इन पारंपरिक उत्पादों का चलन कम हुआ। ऐसे में बांस की खेती के साथ उसके उत्पादों और मूल्यवर्धन को बढ़ावा देने की पहल पारंपरिक कारीगरी को आधुनिक बाजार से जोड़ने का अवसर भी देती है।
कमलाशंकर विश्वकर्मा का मॉडल बांस की खेती को कृषि, जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण, रोजगार और ग्रामीण पर्यटन के साथ जोड़ने की दिशा में एक स्थानीय उदाहरण के रूप में सामने आया है।