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अमिताभ श्रीवास्तव तलत महमूद के मशहूर गाने का यह मुखड़ा विपक्ष की कहानी का एक अहम हिस्सा है चुनाव दर चुनाव , खराब नतीजों के बाद। जून में लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत के लिए बैसाखियों पर मजबूर करने वाला विपक्ष सिर्फ पांच महीने में खुद जमींदोज दिख रहा है। झारखंड की जीत, प्रियंका गांधी का लोकसभा पहुँच जाना इंडिया गठबंधन के लिए जश्न मनाने का मौका नहीं है। महाराष्ट्र की हार के जख्म बहुत दिनों तक रिसते रहेंगे। घाव चाटते रहिये। बेइज्जती बर्दाश्त कीजिए।शरद पवार ने इसे ऐलानिया अपना आखिरी चुनाव बताया था। अब उनकी बची खुची पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में है। यही हाल उद्धव ठाकरे का है। बाल ठाकरे की विरासत पर अब उनका नहीं, एकनाथ शिंदे का कब्जा हो चुका है। मराठी मानुस ने ‘गद्दार’ वाली थ्योरी रिजेक्ट कर दी है। कांग्रेस किस रणनीति से महाराष्ट्र का चुनाव लड़ रही थी, यह समझ से परे था। मैंने पहले भी इस तरफ इशारा किया था। संविधान, जातिगत जनगणना , आरक्षण - सारे मुद्दे बासी साबित हो गये। बीजेपी वोटर को यह कन्विंस करने में कामयाब हो गई कि उसका एजेंडा बेहतर है, उसके पास बेहतर सौगातें हैं। संजय राउत , नाना पटोले जैसे नेताओं ने कश्ती डुबो दी। अब कितना भी आत्ममंथन कर लीजिए , कुछ फायदा नहीं। होता कुछ है नहीं इन आत्मंथनों से। उपचुनावों में पश्चिम बंगाल में ममता का जलवा जरूर कायम है लेकिन बिहार में आरजेडी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी बुरी तरह हारे हैं। जहाँ जिसकी सरकार है, वहाँ उसको कामयाबी मिली है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस को, राहुल गांधी को यह अंदाजा नहीं था कि महाराष्ट्र जैसा अहम राज्य जीतने के लिए बीजेपी कुछ भी कर सकती है, किसी भी हद तक जा सकती है, पानी की तरह पैसा बहा सकती है? दस साल से चुनावों के तौरतरीकों में आए बदलावों को देखने और उनके नतीजे भुगतने के बाद भी कांग्रेस समेत सारा विपक्ष यह क्यों भूल गया कि बीजेपी बेहद खूंखार तरीके से चुनाव लड़ती है, चुनाव दर चुनाव चौबीसों घंटे सिर्फ जीत के लिए सारे समीकरण , सारा गणित लगाती है, चुनाव आयोग उसकी जेब में है, बेहिसाब पैसा फेंका जाता है एक एक वोट के लिए, विरोधियों के खिलाफ हर तरह के पैंतरे आजमाये जाते हैं , मीडिया पर भी कब्जा है? वो चौबीस घंटे लगे रहते हैं तो आप क्यों नहीं उनसे ज्यादा मेहनत करते? अगर ईवीएम गड़बड़ है तो फिर चुनाव ही क्यों लड़ रहे हैं? क्यों नहीं लोकसभा चुनावों से लेकर हरियाणा के चुनावों तक चुनाव आयोग की तमाम गड़बड़ियों के खिलाफ एक संगठित आंदोल किया गया? हर बार हार के बाद वही कहानी दोहराने से क्या हासिल होगा? जनता में हमदर्दी कम से कम होती जायेगी, आपस में झगड़े बढेंगे। कांग्रेस से बार-बार वही बात कहनी पड़ती है- करो या मरो। गांधी का यह मंत्र आँख मूँद कर अमल में उतार लो । वर्ना यही कहानी बार-बार दोहराई जारी रहेगी। हर बार सारा कुसूर दूसरों पर ही मढ़ देने से आपके हालात नहीं बदलेंगे। अपनी गलतियाँ सुधारिये, आइने में अपनी सूरत भी देखिये, उसे दुरुस्त करने की मेहनत कीजिए। सोचने की जरूरत वैकल्पिक मीडिया में विपक्ष के झंडाबरदारों को भी है। यूट्यूब चैनलों पर बहसों के व्यूज बढ़ना ही काफी नहीं है, समाज और राजनीति की सूरत बदलने तक बात पहुँचे , तभी उस पत्रकारिता की सार्थकता है।
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अमिताभ श्रीवास्तव
तलत महमूद के मशहूर गाने का यह मुखड़ा विपक्ष की कहानी का एक अहम हिस्सा है चुनाव दर चुनाव , खराब नतीजों के बाद। जून में लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत के लिए बैसाखियों पर मजबूर करने वाला विपक्ष सिर्फ पांच महीने में खुद जमींदोज दिख रहा है। झारखंड की जीत, प्रियंका गांधी का लोकसभा पहुँच जाना इंडिया गठबंधन के लिए जश्न मनाने का मौका नहीं है। महाराष्ट्र की हार के जख्म बहुत दिनों तक रिसते रहेंगे। घाव चाटते रहिये। बेइज्जती बर्दाश्त कीजिए।शरद पवार ने इसे ऐलानिया अपना आखिरी चुनाव बताया था। अब उनकी बची खुची पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में है। यही हाल उद्धव ठाकरे का है। बाल ठाकरे की विरासत पर अब उनका नहीं, एकनाथ शिंदे का कब्जा हो चुका है। मराठी मानुस ने ‘गद्दार’ वाली थ्योरी रिजेक्ट कर दी है। कांग्रेस किस रणनीति से महाराष्ट्र का चुनाव लड़ रही थी, यह समझ से परे था। मैंने पहले भी इस तरफ इशारा किया था। संविधान, जातिगत जनगणना , आरक्षण - सारे मुद्दे बासी साबित हो गये। बीजेपी वोटर को यह कन्विंस करने में कामयाब हो गई कि उसका एजेंडा बेहतर है, उसके पास बेहतर सौगातें हैं। संजय राउत , नाना पटोले जैसे नेताओं ने कश्ती डुबो दी। अब कितना भी आत्ममंथन कर लीजिए , कुछ फायदा नहीं। होता कुछ है नहीं इन आत्मंथनों से। उपचुनावों में पश्चिम बंगाल में ममता का जलवा जरूर कायम है लेकिन बिहार में आरजेडी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी बुरी तरह हारे हैं। जहाँ जिसकी सरकार है, वहाँ उसको कामयाबी मिली है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस को, राहुल गांधी को यह अंदाजा नहीं था कि महाराष्ट्र जैसा अहम राज्य जीतने के लिए बीजेपी कुछ भी कर सकती है, किसी भी हद तक जा सकती है, पानी की तरह पैसा बहा सकती है? दस साल से चुनावों के तौरतरीकों में आए बदलावों को देखने और उनके नतीजे भुगतने के बाद भी कांग्रेस समेत सारा विपक्ष यह क्यों भूल गया कि बीजेपी बेहद खूंखार तरीके से चुनाव लड़ती है, चुनाव दर चुनाव चौबीसों घंटे सिर्फ जीत के लिए सारे समीकरण , सारा गणित लगाती है, चुनाव आयोग उसकी जेब में है, बेहिसाब पैसा फेंका जाता है एक एक वोट के लिए, विरोधियों के खिलाफ हर तरह के पैंतरे आजमाये जाते हैं , मीडिया पर भी कब्जा है? वो चौबीस घंटे लगे रहते हैं तो आप क्यों नहीं उनसे ज्यादा मेहनत करते? अगर ईवीएम गड़बड़ है तो फिर चुनाव ही क्यों लड़ रहे हैं? क्यों नहीं लोकसभा चुनावों से लेकर हरियाणा के चुनावों तक चुनाव आयोग की तमाम गड़बड़ियों के खिलाफ एक संगठित आंदोल किया गया? हर बार हार के बाद वही कहानी दोहराने से क्या हासिल होगा? जनता में हमदर्दी कम से कम होती जायेगी, आपस में झगड़े बढेंगे। कांग्रेस से बार-बार वही बात कहनी पड़ती है- करो या मरो। गांधी का यह मंत्र आँख मूँद कर अमल में उतार लो । वर्ना यही कहानी बार-बार दोहराई जारी रहेगी। हर बार सारा कुसूर दूसरों पर ही मढ़ देने से आपके हालात नहीं बदलेंगे। अपनी गलतियाँ सुधारिये, आइने में अपनी सूरत भी देखिये, उसे दुरुस्त करने की मेहनत कीजिए। सोचने की जरूरत वैकल्पिक मीडिया में विपक्ष के झंडाबरदारों को भी है। यूट्यूब चैनलों पर बहसों के व्यूज बढ़ना ही काफी नहीं है, समाज और राजनीति की सूरत बदलने तक बात पहुँचे , तभी उस पत्रकारिता की सार्थकता है।
NDA | INDIA | OTHERS |
293 | 234 | 16 |
NDA | INDIA | OTHERS |
265-305 | 200 -240 | 15-30 |