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2.040 हेक्टेयर जमीन से जुड़ी 19 रजिस्ट्रियों पर सवाल, राजस्व रिकॉर्ड की दुरुस्ती से बढ़ी प्रशासन की चिंता

स्थानीय · मनासा · · अपडेट: · नई विधा डेस्क

2.040 हेक्टेयर जमीन से जुड़ी 19 रजिस्ट्रियों पर सवाल, राजस्व रिकॉर्ड की दुरुस्ती से बढ़ी प्रशासन की चिंता

मनासा, 10 सितम्बर। राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जमीन का रकबा यदि उपलब्ध दस्तावेजों से मेल नहीं खाता है, तो मामला केवल एक किसान की जमीन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। रामपुरा तहसील के ग्राम लखमला से सामने आया मामला इसी तरह के सवाल उठा रहा है।

किसान मोहनसिंह पिता मूलचंद मीणा ने अपनी कृषि भूमि से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड में रकबे और बाद में सामने आई रजिस्ट्रियों को लेकर शिकायत की है। हालांकि, इन दावों की वास्तविक स्थिति प्रशासनिक एवं दस्तावेजी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

2010-11 में 2.040 हेक्टेयर जमीन दर्ज होने का दावा

किसान के अनुसार वर्ष 2010-11 में उसके नाम करीब 2.040 हेक्टेयर कृषि भूमि दर्ज थी। वर्ष 2014-15 में जमीन का एक हिस्सा बेचने के बाद करीब 1.3400 हेक्टेयर भूमि शेष रहने का दावा किया गया है।

किसान का कहना है कि वह इस जमीन पर खेती करता रहा और वर्ष 2017 के आसपास इसी भूमि के आधार पर सोसायटी के माध्यम से कृषि ऋण भी लिया था। इसके बाद वर्ष 2022 में शेष 1.3400 हेक्टेयर भूमि ग्रीनको कंपनी को बेचने और नामांतरण की कार्रवाई होने की बात सामने आई।

एक ही सर्वे नंबर से 19 रजिस्ट्रियों का दावा

मामले में उस समय सवाल खड़े हुए जब किसान ने अपने पुराने सर्वे नंबर से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की। किसान के अनुसार मुंबई, पुणे सहित अलग-अलग स्थानों के करीब 19 लोगों के नाम 100-100 आरी की रजिस्ट्रियां इसी सर्वे नंबर और रकबे से संबंधित रिकॉर्ड में सामने आईं।

किसान का मुख्य सवाल है कि जब मूल रकबा 2.040 हेक्टेयर था और बिक्री के बाद 1.3400 हेक्टेयर जमीन शेष बताई गई, तो उसी सर्वे नंबर से इतने बड़े रकबे की अलग-अलग रजिस्ट्रियां किस आधार पर दर्ज हुईं।

किसान ने वर्ष 2010 से 2026 तक की प्रमाणित नकलों और वर्ष 2015 के बाद की कंप्यूटर जनित खाताखसरा नकलें उपलब्ध होने का दावा किया है। इनमें अलग-अलग नाम दर्ज होने की बात कही गई है।

शिकायत के बाद रिकॉर्ड में दुरुस्ती की प्रक्रिया

मामले को लेकर किसान ने मनासा एसडीएम के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत कर जांच और न्याय की मांग की। किसान के अनुसार इसके बाद रामपुरा तहसील न्यायालय में इंद्राज दुरुस्ती का आवेदन भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें रिकॉर्ड की कथित विसंगति को त्रुटि बताया गया है।

यहीं से एक और सवाल सामने आया है कि यदि रिकॉर्ड में यह केवल तकनीकी त्रुटि थी, तो उसका निराकरण पहले क्यों नहीं हुआ और शिकायत के बाद ही दुरुस्ती की प्रक्रिया क्यों सामने आई। इन सवालों का जवाब मूल राजस्व रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

जांच में किन बिंदुओं का मिलान जरूरी

मामले की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए वर्ष 2014 से वर्तमान तक संबंधित सर्वे नंबर में हुए प्रत्येक नामांतरण, इंद्राज, रजिस्ट्री, दुरुस्ती आदेश और रकबा परिवर्तन की क्रमवार जांच महत्वपूर्ण होगी।

इसके साथ ही प्रत्येक रजिस्ट्री में दर्ज भूमि की वास्तविक इकाई, रकबा, विक्रेता-खरीदार विवरण और संबंधित नामांतरण आदेश का मूल राजस्व रिकॉर्ड से मिलान किया जाना आवश्यक होगा।

किसान के दावे के अनुसार 100-100 आरी की 19 रजिस्ट्रियों का कुल रकबा मूल भूमि से काफी अधिक बैठता है। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि रिकॉर्ड में दर्ज रकबे और वास्तविक दस्तावेजों के बीच अंतर किस स्तर पर और किस प्रक्रिया के तहत आया।

पटवारी से संपर्क का प्रयास

मामले को लेकर तत्कालीन पटवारी घनश्याम डांगी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

फिलहाल मामला प्रशासन के समक्ष है। यदि रिकॉर्ड में केवल तकनीकी त्रुटि है तो उसके दस्तावेजी आधार पर स्पष्ट समाधान सामने आना चाहिए। वहीं, यदि जांच में नियम विरुद्ध नामांतरण या रिकॉर्ड में किसी प्रकार की हेरफेर सामने आती है तो जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।

मामले में अंतिम स्थिति प्रशासनिक जांच और मूल राजस्व दस्तावेजों के मिलान के बाद ही स्पष्ट होगी।

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