कमलनाथ सरकार गिरने में दिग्विजय सिंह का भी हाथ: सज्जन सिंह वर्मा के बयान से कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति फिर चर्चा में

कमलनाथ सरकार के पतन पर फिर क्यों उठे सवाल?
मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर सरकार बनाई थी। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और सत्ता में भागीदारी को लेकर मतभेदों की चर्चाएं सामने आती रहीं।
मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने और उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफों के बाद सरकार अल्पमत में आ गई। इसके बाद कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया।
करीब छह साल बाद सज्जन सिंह वर्मा के बयान ने इस राजनीतिक घटनाक्रम को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, सरकार गिरने के पीछे अलग-अलग नेताओं की भूमिका को लेकर किए जा रहे राजनीतिक दावों को तथ्यों और संबंधित बयानों के आधार पर समझना जरूरी है।
सिंधिया की नाराजगी को लेकर दिग्विजय सिंह ने क्या कहा था?
इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक साक्षात्कार में कमलनाथ सरकार के पतन और ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने से जुड़े घटनाक्रम पर अपनी बात रखी थी।
उनके अनुसार, 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद सिंधिया मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। इसके बाद सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का विकल्प भी दिया गया था, हालांकि उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
साक्षात्कार में सामने आए विवरण के अनुसार, सिंधिया प्रदेश संगठन में अपने करीबी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिलाना चाहते थे। इस संदर्भ में तुलसी सिलावट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और गोविंद सिंह राजपूत को उपमुख्यमंत्री बनाने की मांग का भी उल्लेख किया गया।
नेतृत्व और संगठन को लेकर बढ़ती गई खींचतान
कांग्रेस सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पद, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर नेताओं के बीच मतभेदों की चर्चाएं होती रहीं। कमलनाथ और सिंधिया के बीच बढ़ती दूरी को भी सरकार के राजनीतिक संकट से जोड़कर देखा गया।
सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफों ने सरकार का बहुमत समाप्त कर दिया। इस घटनाक्रम ने मध्यप्रदेश की राजनीति की दिशा बदल दी और कांग्रेस के नेतृत्व तथा संगठनात्मक समीकरणों पर कई सवाल खड़े किए।
कमलनाथ सरकार के पतन को केवल एक नेता या एक कारण से जोड़कर देखने के बजाय उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, पार्टी के भीतर मतभेदों और सत्ता के समीकरणों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।