प्रादेशिक सेना दिवस आज: नीमच की सैन्य परंपरा और नागरिक सैनिकों के योगदान को सलाम

प्रादेशिक सेना की विशेषता यह है कि पात्र नागरिक अपने नियमित रोजगार, पेशे या व्यवसाय के साथ सैन्य सेवा में योगदान दे सकते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और कारोबारी जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग प्रशिक्षण और निर्धारित सैन्य जिम्मेदारियों के माध्यम से देशसेवा का अवसर प्राप्त करते हैं।
प्रादेशिक सेना आवश्यकता के समय नियमित सेना को सहयोग देने के साथ नागरिक प्रशासन की सहायता, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों में भी भूमिका निभाती है।
1857 से जुड़ा इतिहास, 1949 में औपचारिक स्थापना
प्रादेशिक सेना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौर में गठित स्वयंसेवी बलों तक जाती है। स्वतंत्रता के बाद प्रादेशिक सेना अधिनियम 1948 में पारित हुआ और 9 अक्टूबर 1949 को तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने इसका औपचारिक उद्घाटन किया। इसी दिन को प्रतिवर्ष प्रादेशिक सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है।
नीमच की पहचान भी देश की सैन्य परंपरा से जुड़ी रही है। शहर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की ऐतिहासिक जन्मस्थली के रूप में भी जाना जाता है। इस पृष्ठभूमि में प्रादेशिक सेना दिवस जिले के लिए सैन्य विरासत और नागरिक सहभागिता को याद करने का अवसर है।
आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में भूमिका
प्रादेशिक सेना की जिम्मेदारियां केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर इसकी इकाइयां नागरिक प्रशासन की सहायता, राहत एवं बचाव कार्यों और आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने में योगदान देती हैं। इसकी इकोलॉजिकल टास्क फोर्स वृक्षारोपण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्य भी करती है।
नीमच की सैन्य परंपरा से प्रेरणा
नीमच और आसपास के क्षेत्रों में सैन्य परंपरा से जुड़ाव युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। प्रादेशिक सेना दिवस पर देश की सुरक्षा, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी के लिए योगदान देने वाले सभी सैनिकों और नागरिक सैनिकों के समर्पण को सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।