logo
add image

बेसन के लड्डू और कमलनाथ का बयान !

किस्सा पत्रकारिता से जुड़ा है। नएपन की छटपटाहट से लबरेज अखबार में रिपोर्टर ने बताया कि वह अगले साल चने की बम्पर पैदावार होने की संभावना वाली खबर दे रहा है। संपादक और उसके मौजूदा बॉस लोगों को इस खबर में दम नजर नहीं आया। खेती-किसानी की बात महानगर के एक बड़े अखबार में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों के लिए ठेठ देहातीपन वाली थी। लिहाजा सीनियर्स ने अपना आला दिमाग खर्च किया। पूछा गया, ‘चने से क्या बनता है ?’ जवाब आया, ‘बेसन।’ लिहाजा उन आला दिमागों ने एक जोरदार आईडिया निकाला। कहा, खबर यही बनाना चाहिए कि इस साल गणपति उत्सव के दौरान बेसन के लड्डू सस्ते मिलेंगे।
कल कई न्यूज चैनल देखते हुए यह घटना याद आई और फिर एक जोरदार हंसी का छूटना स्वाभाविक प्रक्रिया थी। चैनल जिस तरह मध्यप्रदेश के ताजा-ताजा बने मुख्यमंत्री कमलनाथ को राज ठाकरे के बरअक्स खड़ा कर रहे थे, वह चने की बम्पर फसल को सस्ते ‘बेसन के लड्डू’ से जोड़ने जैसा प्रयास ही तो था। नाथ और ठाकरे की फितरत में जमीन-आसमान का अंतर है। ठाकरे ने महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों को खदेड़ने का हिंसक ऐलान किया था। बेकसूर ठेला चालक, रेहड़ी वाले और आॅटो चालक उनके सैनिकों के निशाने पर आ गए थे। देश की औद्योगिक राजधानी में ‘आमची मुंबई’ की क्षेत्रीय, घटिया और हिंसक राजनीति के लिए ठाकरे ने जो इस्तेमाल किया, वह उन्हें जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों के समकक्ष लाता है, न कि कमलनाथ के। नाथ ने केवल यह कहा कि जो उद्योग इस प्रदेश के सत्तर फीसदी लोगों को रोजगार नहीं देंगे तो राज्य सरकार उन्हें विशेष छूट नहीं देगी। उनकी चिंता थी कि फिर उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग यहां आकर नौकरी करने लगेंगे।
इसमें न तो किसी का बहिष्कार करने की बात है और न ही किसी हिंसात्मक उकसावे का संकेत है। यह नीति शिवराज सरकार के दौरान भी थी कि जो उद्योग मध्यप्रदेश के स्थानीय लोगों को सत्तर फीसदी रोजगार देंगे, उन्हें राज्य सरकार अतिरिक्त छूट देगी। इसमें केवल राज्य की बड़ी आबादी की वह चिंता है, जो हर मुख्यमंत्री अपने-अपने प्रदेश के लिए करता है। अब शिवराज तो तमाम इंवेस्टर्स मीट के बावजूद बहुत ज्यादा उद्योग मध्यप्रदेश में नहीं ला पाए लेकिन कमलनाथ से फिलहाल उम्मीद की जा सकती है। लिहाजा स्थानीय रोजगार की दिशा में नाथ के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए थी, लेकिन हुआ यह कि उनके कथन की चीरफाड़ शुरू कर दी गई। नाथ का एक विजन है। छिंदवाड़ा में वह उसे साकार कर चुके हैं। अब यदि वह इसी सरोकार से पूरे प्रदेश की चिंता कर रहे हैं, तो उसे क्षेत्रवाद या राज्यवाद जैसी संकीर्ण संज्ञा भला कैसे दी जा सकती है ?
वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह का एक आलेख हाल ही में पढ़ा। उसमें उन्होंने बताया कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्री बनते ही नाथ ने सिगरेट पीना छोड़ दिया था। कहा था, देश के पर्यावरण को बचाए रखने के लिए मैं इतना योगदान तो कर सकता हूं। राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ाने की गरज से ही गई उनकी बात भी बतौर मुख्यमंत्री महती योगदान की गरज से ही कही गयी है, लेकिन सनसनी पसंद मीडिया ने वही किया, जो उसकी टीआरपी की अंधी गुफा में समा सकता था।
नाथ ने प्रदेश में बाहरी राज्यों के लोगों की उपस्थिति पर एक शब्द भी नहीं कहा। लेकिन विरोधी सियासी दल भी चैनलों के रंग में रंग गए, अब विरोधी से तो तारीफ की उम्मीद की नहीं जा सकती। आज की राजनीतिक परिस्थितियों में तो यह असंभव ही है, लिहाजा, उस पर सवाल नहीं है। जाहिर है सत्ता की दौड़ में पिछड़ने की खिसियासहट निकालने के लिए उन्हें खम्भा मिल गया है। चने के उत्पादन को बेसन के लड्डू से जोड़ने का काम प्रिंट मीडिया में यदि कुटीर उद्योग की तरह पनपा है तो खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वह किसी औद्योगिक क्षेत्र की तरह पांव पसार चुका है !

Top