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अच्छा होता कि राहुल माफी मांग लेते

राहुल गांधी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस की भूमिका से इनकार किया हैं।

ब्रिटेन की संसद में एक सवाल के जवाब में दिया गया उनका यह बयान वैसा ही है, जैसे नरेंद् मोदी समेत भाजपा और संघ के तमाम नेता गुजरात में 2001 के मुसलमान विरोधी दंगों में भाजपा या गुजरात सरकार की भूमिका से इनकार करते रहे हैं।
दरअसल 1984 और 2002 के दंगे स्पष्ट रूप से दो समुदायों के खिलाफ व्यापक पैमाने पर राज्य प्रायोजित नरसंहार थे, जिनके लिए क्रमश: कांग्रेस और भाजपा स्पष्ट रूप से जिम्मेदार हैं। जहां तक 1984 के सिख नरसंहार की बात है, मैं भी इंदौर में उसका चश्मदीद रहा हूँ और उसके कई वीभत्स दृश्य अभी भी मेरे जेहन में ताजा हैं। मैं उन दिनों कॉलेज में पढते हुए अपने कॅरिअर के शुरूआती दौर में था और नवभारत में कार्य कर रहा था।
मुझे अच्छी तरह याद है- 31 अक्टूबर को श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या हुई थी और 1 नवंबर को सुबह मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह इंदौर आए थे। इंदौर हवाई अड्डे पर उन्होंने पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत करने के अलावा इंदौर के तत्कालीन कलेक्टर अजीत जोगी से भी बंद कमरे में बातचीत की थी। इसके बाद अर्जुन सिंह बिना शहर में प्रवेश किए ही वहां से भोपाल लौट गए थे।
उनके लौटने के तुरंत बाद शहर में एक तरह से दंगाइयों का साम्राज्य कायम हो गया था। हर तरफ आग की लपटें उठती दिख रही थीं। आसमान धुएं के बादलों से ढंक गया था। सिखों को ढूंढ-ढूंढकर और पकड-पकड कर मारा जा रहा था। उनके घरों और दुकानों में लूटपाट कर उन्हें और उनके वाहनों को भी आग के हवाले किया जा रहा था। शहर के जूनी इंदौर इलाके में स्थित प्रधानसिंह की चाल (बस्ती), जिसमें साधारण आर्थिक स्थिति वाले करीब चालीस सिख परिवार रहते थे, को आग लगाकर मलबे के ढेर में बदल दिया गया था। उन परिवारों के ज्यादातर लोग जिंदा ही जल मरे थे। होल्कर शासकों का ऐतिहासिक राजबाडा और शहर के कई गुरुद्वारे भी आग की भेंट चढ चुके थे।
कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं के निर्देशन में चले इस पूरे उपक्रम में कांग्रेस के निचले स्तर के कॉडर के साथ संघ के भी निचले स्तर के स्वयंसेवकों की सहभागिता स्पष्ट रूप से नजर आ रही थी। यह हिंसक तांडव पूरे दो दिन तक जारी रहा था और स्थानीय पुलिस-प्रशासन न सिर्फ मूकदर्शक बना रहा था, बल्कि जो लोग सिखों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, उनके साथ बदसुलूकी भी कर रहा था। इस पूरे घटनाक्रम की एक विस्तृत रपट मैंने अपने वरिष्ठ साथी सुभाष रानडे के साथ मिलकर तैयार की थी, जो उस समय डॉ. महीपसिंह के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'संचेतनाह्ण में छपी थी।
संघ के कॉडर ने न सिर्फ सिख विरोधी हिंसा और लूटपाट में भागीदारी की बल्कि करीब डेढ महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी संघ ने व्यापक पैमाने पर परोक्ष रूप से कांग्रेस का समर्थन किया था, जिसकी बदौलत कांग्रेस को 425 सीटें हासिल हुई थीं (हालांकि बेखबरी टीवी चैनलों में कार्यरत पठित मूर्ख 282 सीटों को ही प्रचंड और अभूतपूर्व बहुमत बताते रहते हैं)।
उस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में हिंदू बैकलेस इतना जबर्दस्त था कि भाजपा को महज दो सीटें ही मिल पाई थीं। भाजपा के बाकी उम्मीदवार ही नहीं, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज भी संघ के भीतरघात के शिकार होकर ग्वालियर में माधवराव सिंधिया के मुकाबले बुरी तरह हारे थे, जबकि ग्वालियर को वे अपने लिए सबसे सुरक्षित सीट मानते थे।
यह सही है कि 1984 में सिखों को 'सबक सिखानेह्ण का आह्वान कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर नहीं किया था, फिर भी जो कुछ हुआ उसकी जिम्मेदारी से कांग्रेस इनकार नहीं कर सकती। अच्छा तो यह होता कि राहुल 1984 की हिंसा में कांग्रेस की लिप्तता को कुबूल करते हुए माफी मांग लेते। ऐसा करने से उन्हें कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होने वाला था, बल्कि फायदा यह होता कि इस बारे में बार-बार उठने वाले सवाल की धार ही कुंद पड जाती। डॉ. मनमोहन सिंह तो प्रधानमंत्री रहते हुए ऐसा कर ही चुके हैं।
हालांकि यह भी सही है कि गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ सत्ता प्रायोजित हिंसा के लिए वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री या उनकी पार्टी ने भी माफी मांगना तो दूर, खेद तक नहीं जताया है। लेकिन इससे क्या? यह जरुरी तो नहीं कि भाजपा के तब के या अब के नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया तो कांग्रेस भी ऐसा नहीं करे और अपने को भाजपा की घटिया फोटोकॉपी साबित करती रहे।

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