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शहर में खुलेआम हो रहा नशे का कारोबार?

आसानी से मिल रही स्मैक-ब्राउन शुगर,नशे का शिकार हो रही युवा पीढ़ी

नीमच। पहले एक वक्त था जब शहर का खारी कुआं इलाका स्मैक,ब्राउन शुगर आदि नशे के कारोबार का गढ़ माना जाता था,जहां 50 से 100 रुपए में इनकी पुड़िया आसानी से मिल जाया करती थी।अब इस मामले में इन सब एरियों को पीछे छोड़कर काफी आगे निकल चुका है शहर का एकता कॉलोनी स्थित झोपड़पट्टी इलाक़ा,जहां यह नशे का कारोबार खुलेआम संचालित हो रहा है। नशे के सौदागरों को न कोई डर है न कोई दहशत।
एकता कॉलोनी के झोपड़पट्टी में बिक रही है खुलेआम स्मेक और ब्रॉउनशुगर
इस इलाके में दिन में चोरी-छिपे 100 से 200 रुपए में स्मैक की मात्रा के हिसाब से इसकी की पुड़िया मिल जाया करती है।वहीं रात लगभग 10:00 बजे बाद तो इसका बाजार ही गुलज़ार हो जाता है,जहां नशे के सौदागर चंद रुपयों के लालच में खुलेआम नशे का कारोबार करते हैं। शहर के बेरोजगार युवाओं का एक बड़ा वर्ग नशे के जाल में फंस चुका है जो इन इलाकों में नशे की तलब लिए घूमता हुआ आसानी से दिखाई दे जाता है। यह लत ऐसी होती है जो एक बार लगने के बाद आसानी से छूटती नहीं है एवं इसकी पुड़िया के लिए व्यक्ति ऐसे तड़पता है,जैसे बिना पानी के मछली।

इस प्रकार फंसाते हैं नशे के जाल में युवाओं को-
एक बार जिसको यह लत लग जाती है फिर वह इसके बिना नहीं रह पाता।इस बात से भली-भांति परिचित यह नशे के सौदागर शुरुआत में नौजवानों को पैसा न होने पर उधार नशे की पुड़िया देकर उन्हें धीरे धीरे इसकी लत लगाते हैं,एवं इसका आदी होने के बाद जब वह इसके बिना रह नहीं पाते तब उनसे सारा अगला-पिछला हिसाब निकालकर पूरे पैसे वसूलते हैं।पैसा ना होने पर जब इन बेरोजगार युवाओं को नशे की तलब लगती है तब यह चोरी-चकारी,चैन स्नैचिंग आदि वारदातों को अंजाम देने में लिप्त हो जाते हैं,एवं स्मैक की पुड़िया हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं।यहां तक की किसी की जान लेने से भी गुरेज नहीं करते।

बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी,तबाह हो रहे कई परिवार-
इस नशे की लत के चलते शहर एवं देश का भविष्य कहे जाने वाले कई पढ़े लिखे बेरोजगार युवा भी अपना भविष्य तबाह करते नजर आ रहे हैं,व नशे की लत का शिकार होकर पन्नियां, पुट्ठे,कागज़ आदि बिनते हुए दिन भर इसी जुगाड़ में नजर आते हैं कि किसी तरह उनकी स्मैक की गुड़िया के पैसों का जुगाड़ हो जाए।खड़ी बोलचाल की भाषा में इनको "पुड़िया" कहा जाता है। ऐसे कई युवक जो अपने मां- बाप की इकलौती संतान है या जिनकी शादी हो चुकी है एवं उनके परिवार हैं वे उनकी इस लत से परेशान होकर तबाह एवं बर्बाद हो चुके हैं।हालात यह है कि उनके घरों में अब कोई कमाने वाला नहीं है।घर की औरतें किसी तरह बर्तन मांजकर या झाड़ू-पोंछा कर परिवार का पालन पोषण करने हेतु कुछ पैसों का जुगाड़ भी करती है तो नशे के आदी हो चुके यह नशेड़ी उनके वह पैसे भी लड़-झगड़कर छीन ले जाते हैं।एसे कई परिवारों के उदाहरण आपको शहर में मिल जाएंगे।

क्या जीरो टोलरेंस पर कार्य करने वाले डीआईजी एवं एसपी इस पर लगाम कसने की करेंगे पहल?

जीरो टॉलरेंस नीति की हिमायत करने वाले पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार रॉय जो कि काफी सक्रिय है एवं स्वयं भी जीरो टॉलरेंस पर चल रहे हैं एवं रतलाम रेंज डीआईजी गौरव राजपूत ने भी अपना कार्यभार ग्रहण करते ही प्रथम दिवस ही नीमच का दौरा किया था एवं पत्रकारों से रूबरू होते हुए कहा था कि वे "जीरो टॉलरेंस-नो नॉनसेंस" की नीति के तहत काम करेंगे।यदि कोई भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी किसी भी अवैधानिक गतिविधि में लिप्त पाया जाता है तो उस पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी।अब देखना यह है कि डीआईजी एवं एसपी की जीरो टॉलरेंस नीति एवं साफ छवि के चलते नशे के इस कारोबार को बेनकाब करते हुए शहर की युवा पीढ़ी का भविष्य बर्बाद होने से किस प्रकार बचा पाते हैं।

सब अपराधों की जड़ है नशा

एक बार नशा करने के बाद इंसान स्वयं के वश में नहीं रहता।नशा करने के पश्चात उसमें सोचने-समझने की शक्ति खत्म सी हो जाती है। नशे में वह क्या कर रहा है,यह उसे मालूम नहीं रहता। नशे में वह इंसान से जानवर तक बन जाता है।इसलिए वह नशे की हालत में चोरी, डकैती, लूटपाट, हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दे देता है।अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं नशे में वाहन चलाने पर घटित होती है।अधिकांश अपराधों एवं फसाद की जड़ नशा ही है।अतः शहर की युवा पीढ़ी को नशे की बुरी लत से बचाना एवं इसके लिए जिम्मेदार अपराधियों को सलाखों के पीछे धकेल कर समाज को साफ-सुथरा रखने की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन,जिला प्रशासन,सामाजिक संस्थाओं एवं संगठनों के साथ हर समझदार एवं जिम्मेदार शहरी नागरिक की भी है।

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