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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का औचित्य

महिला दिवस पर खास

कल्पना मोगरा
युग नायक! भविष्य दृष्टा! राष्ट्र निर्माता! स्वामी विवेकानंद ने वर्षों पूर्व कहा था कि "किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर वहाँ की
महिलाओं की स्थिति है। हमें महिलाओं को ऐसी स्थिति में पहुंचा देना चाहिये जहाँ वे अपनी समस्याओं को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सके।

हमें नारी शक्ति के उद्धारक नहीं वरन् उनके सेवक और सहायक बनाना चाहिये। भारतीय नारियाँ संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भाँति अपनी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता रखती है। आवश्यता है उन्हें उपयुक्त अवसर देने की। इसी आधार पर भारत के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं संनिहित है।"

        निःसंदेह! नारी के प्रति पुरुष समाज के सहयोगात्मक व उत्साहवर्धनात्मक व्यवहार से, महिला सशक्तिकरण में मिले अधिकारों से तथा नारी के स्वयं के अथक प्रयास से , नई सहस्त्राब्दी में देश के विकास व उन्नति में नारी की एक नई छवि उभर कर सामने आई है। कहीं घुँघट में छिपकर दबे सहमें कदमों को पुरुष के साथ मिलाते हुए, तो कहीं रुढियों से लड़ते हुए भारतीय नारी ने सदियों के संघर्षों की आग में तपाकर अपनेआप को सोना बनाया है। उसने घर की देहरी का सम्मान करते हुए अपने आप को साबित किया है। प्रेम,स्नेह एवं मातृत्व के गुणों के साथ साथ खेतों में फसल काटने से लेकर नीलगगन के गर्भ अंतरिक्ष तक में उसने अपने परिश्रम, प्रतिभा व साहस का परिचय देते हुए अपने अस्तित्व का लोहा मनवाया है। कल्पना चावल, सुनीता विलियम्स, मदर टेरेसा, लता मंगेशकर, राज्योगिनी दादी जी ,सिस्टर शिवानी आदि अनेक ऐसी महिलाएँ है जिन्होंने नारी जाती को सशक्त व गौरान्वित करते हुए देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
        बावजूद इसके हमारे जेहन में ऐसे कई सवाल उठते है जो हमारे देश की स्वतंत्र ! सशक्त ! आश्वस्त ! व प्रगतिशील ! नारी पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करते है कि, तो फिर क्यों आज दीमक की तरह बढ़ती बलात्कार की घटनाओं ने आश्वस्त नारी के होश उड़ा रखे है ? क्यों आज नारी बाहर ही नही अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है ? क्यों आज कई सभ्य परिवारों की महिलाएँ अपने ही पुरुषो के अत्याचारों को चुपचाप सहन कर रही है ? क्यों लिंग परीक्षण व कन्या भ्रूण हत्या आज भी अनवरत जारी है? क्यों शिक्षा के क्षेत्र में आज भी गाँवों की महिलाएँ पिछड़ी हुई है? क्यों आज दो साल - चार साल की मासूम बच्चियाँ पुरुषों की हवस का शिकार हो रहीं है?
      इसके लिए काफी हद तक पश्चिमी सभ्यता, अश्लील विज्ञापन व अश्लील सिनेमा जिम्मेदार है। इसकी वजह से हमारे मूल संस्कार, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता विलुप्त होती जा रही है। अशिक्षा ,अज्ञानता व नारी शक्ति की एकता के अभाव के कारण भी महिलाएँ न अपने हक में बनाए कानून का फायदा उठा पाती है और न अपने निर्णय स्वयं ले पाती है। यही वजह है कि वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों, लिंग परीक्षण एवं कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर निर्भिक हो कर विरोध नहीं कर पाती।
        समस्या बड़ी विकराल है जिसका समाधान केवल वर्ष में एक दिन 8 मार्च को महिला सशक्तिकरण के रूप में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना लेने, वन बिलियन राईज़िंग की घोषणा कर देने, नारी उत्थान की बड़ी बड़ी बातें कर लेने, बड़ी बड़ी सेमिनार व विचार गोष्ठियाँ कर लेने मात्र से कुछ नहीं होगा बल्कि वर्ष भर इस पर अमल करना होगा। नारी , नारी की दुश्मन नहीं अपितु नारीशक्ति को संगठित हो नारी का सच्चा मित्र बनना होगा... जो एकता हम किसी नारी के साथ अनहोनी होने के बाद दिखाते है वो एकता यदि हम हर नारी के विकास, उत्थान , उन्नति ,प्रगति व उसकी सुरक्षा के उपायों में दिखाएँ तो निश्चित ही हम कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रताड़ना जैसे अनेक काँटों को उखाड़ फेंकने में सक्षम होंगे।
      आज हर माँ का भी दायित्व बनता है कि वह बचपन से ही अपने बेटों को नारी सम्मान के ऐसे मज़बूत संस्कार दे कि भविष्य में वह नारी के साथ कुछ गलत करने की बात तो दूर उसकी ओर गलत निगाह से देखने की हिम्मत भी ना कर सके।
    नारी को सशक्त बनाने के लिए हमें *बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ* के नारे को सार्थक करते हुए लिंगानुपात में समानता लाने का अथक प्रयास करना होगा।
      ग्रामीण महिलाओं को अपने अधिकारों का बोध कराने व उन्हें सशक्त बनाने के लिए वहाँ की शिक्षित महिलाओं को साझा प्रयास करना चाहिये।
        नारी सुरक्षा में सरकार द्वारा कठोर कानून बनाने की आवश्यकता के साथ साथ आवश्यकता है पुरुष समाज द्वारा नारी के प्रति अपने नजरिये, अपनी दृष्टि, अपनी सोच को बदलने की कि नारी केवल कामिनी नहीं जगत् धात्री भी है, देवी तुल्य सृष्टि की सृजन कर्ता व निर्माता भी है। वह अलंकरण मात्र नहीं, समाज को जीवंत बनाने वाली प्रेरणा शक्ति भी है। वह राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है... उसका सम्मान होना ही चाहिये। जिस दिन पुरुष समाज नारी सम्मान के इस स्वरूप को समझ लेगा और नारी उत्थान में नारी शक्ति संगठित हो नारी का साथ देगी उस दिन नारी निश्चित पूर्ण रूप से सुरक्षित,सशक्त व सबल होगी।
खैर...! हमें अपनी स्मिता अपने नारित्व एवं अपने अधिकारों की रक्षा स्वयं करना है। संगठित हो यह अभियान हर दिन चलाना है, ऐसा नहीं कि मात्र एक दिन (8मार्च) की इवेंट बनकर वर्षभर के लिए गुमनामी के बस्ते में चला जाए। हमें अपने प्रयासों से अपना हर दिन शक्ति का,हर दिन इंसानियत का (जिसकी केंद्र बिंदु नारी हो) बनाना होगा, तभी हमारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना सार्थक होगा अन्यथा...निर्भया कांड, डॉ. प्रियंका रेड्डी कांड, दो साल की बच्ची - चार साल की बच्ची के साथ कुकृत्य, कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनोने व नारी स्मिता को तार तार कर देने वाले कांड होते रहेंगे और प्रशासन के कठोर कानून भी इन घिनोने कृत्यों को रोक नहीं पाएँगे।

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