विवेक तिवारी की हत्या और यूपी का फासिस्ट निजाम

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‘एप्पल’ जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक स्थानीय (लखनऊ के) मैनेजर विवेक तिवारी को भी इसी तरह कल पुलिस ने गाड़ी न रोकने पर गोली से उड़ा दिया। विवेक तिवारी कोई आतंकी नहीं थे एक कामकाजी नौकरीपेशा व्यक्ति थे। उनकी पत्नी बिलखते हुए कह रही थी, “हम तो योगी सरकार के आने पे बहुत खुश हुए थे, हमें क्या पता था कि हमारे साथ ये सब होगा”। इनकी सामाजिक – आर्थिक – जातीय पृष्ठभूमि के आधार पर इनका योगी के सत्ता में आने पर खुश होना कोई आश्चर्य की बात नहीं।
यूपी पुलिस “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” हो गई है। “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट”, इस भयानक और दुर्दान्त शब्द को बॉलीवुड द्वारा जनता के बीच स्वीकार्य बनाने के लिए खूब महिमा मंडित किया गया था। राज्य के वेतन पर पलते वर्दी वाले हत्यारों के लिए एक ऐसा शब्द ईजाद किया गया, और “सिंघम” , “गंगाजल”, टाइप फिल्में दशकों तक बनाकर राज्य के इस आतंकवादी चरित्र को जनता के हितैषी के रूप में स्थापित करने की कोशिशें हुई। जाहिर है, बॉलीवुड इस बर्बर राज्य और व्यवस्था का कितना विश्वस्त सेवक है।
योगी के सत्ता में आने के बाद यूपी पुलिस पर “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” होने का तमगा लगा, और सवर्ण उच्च मध्य वर्गीय पारंपरिक समर्थकों के बीच योगी सरकार ने अपने एनकाउंटरों के लिए खूब वाहवाही लूटी। पुलिस द्वारा मुसलमानों और बहुजनों की हर न्यायतिरिक्त(एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल) हत्याओं को जायज ठहराया गया। आम सवर्ण मध्यवर्गीय नौकरीपेशा लोग या छोटे व्यापारी जो अपने काम धंधे करके अपना परिवार चलाते हैं, उन्हें उन मुसलमानों , बहुजनों की हत्याओं पर खुश होना सिखाया गया जिन्हें वे जानते तक नहीं।
अखबार में खबर आती, “यूपी पुलिस ने फलाना क ख ग को ढिमका चौक पर मार गिराया”, “यूपी की जेल में फलाना च छ ज की हिरासत में संदिग्ध मौत” जैसी खबरों में उन्हें खुश होने का मौका मिलता। आज विवेक तिवारी के साथ जो हुआ, वैसी वारदातें अल्पसंख्यकों और बहुजनों के साथ बहुत आम हो चली थी, और खबर तक न बनती। उस तबके को यह इल्म तक न था कि जिस निरंकुश हत्यारी सत्ता को वह चीयर कर रहा है, उसकी आँच उसके खुद के घर तक भी पहुँचेगी । विवेक तिवारी के परिवार के साथ हमारी सहानुभूति है। किसी भी बेगुनाह की हत्या राजकीय आतंकवाद है और भारतीय राजसत्ता जो अब फासीवादी रूप अख्तियार कर चुकी है, उसके इस फासिस्ट स्वरूप का सख्त प्रतिकार करना चाहिए।
और यह घटना न तो अकेली है, न पहली और न ही दुर्घटना। यह उसी ट्रेंड का अगला चरण है जिसके पिछले चरणों में अल्पसंख्यक व बहुजन शिकार होते रहे हैं ।
अब जब आँच इस मध्यवर्गीय तबके तक पहुँची है तो उसे यह समझना होगा कि जैसे जैसे यह फासिस्ट सत्ता और निरंकुश होती जाएगी, वह भी अपने कम्फर्ट झोन में सुरक्षित नहीं बचेगा, न ही उसकी लोकतांत्रिक आजादी बचेगी। किसी शहर में किसी मंदिर के निर्माण की लड़ाई विवेक तिवारी को वापस नहीं लाएगी। उम्मीद है कि ये सारी बातें वे लोग जरूर सोचेंगे जो आज तक इन सब चीजों को देखकर भी अनजान बन यूपी के इस फासिस्ट निजाम के प्रति सहानुभूति रखते आए हैं।

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