अयोध्या पर फैसले की आस

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस पुराने फैसले कि ‘मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं” पर जिस तरह फिर से विचार करने से इनकार किया, उससे यह उम्मीद बढ़ गई है कि उसकी ओर से अयोध्या विवाद पर शीघ्र ही फैसला सुनाया जा सकता है। हालांकि इसे लेकर तब तक सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता, जब तक अयोध्या विवाद की दिन-प्रतिदिन सुनवाई शुरू नहीं हो जाती। इस सिलसिले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अयोध्या मामले की सुनवाई में बाधा इसीलिए आई, क्योंकि सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य संगठनों के वकीलों की ओर से अचानक इस पर जोर दिया जाने लगा कि पहले 1994 के उस फैसले को नए सिरे से विचार के लिए संविधान पीठ के पास भेजा जाए, जिसमें यह कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है। यद्यपि 1994 के इस फैसले का अयोध्या विवाद से कोई सीधा संबंध नहीं था, फिर भी ऐसे तर्क दिए गए कि उक्त फैसला अयोध्या विवाद की सुनवाई को प्रभावित करेगा। गत दिवस सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि 1994 का फैसला एक अलग संदर्भ में था और उसका अयोध्या विवाद से कोई लेना-देना नहीं। यह हैरानी की बात है कि इस सहज-सामान्य निष्कर्ष तक पहुंचने में इतना समय लग गया। आखिर जब 1994 के फैसले का अयोध्या मसले से कोई लेना-देना ही नहीं था तो फिर उस पर माथापच्ची करने का क्या मतलब? इस सवाल का एक जवाब तो यही लगता है कि अयोध्या मामले की सुनवाई में अड़ंगा डालने की कोशिश के तहत ही 1994 के फैसले पर नए सिरे विचार करने की मांग की गई। ध्यान रहे कि जब अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी तो बड़े जोर-शोर से एक दलील यह भी दी गई थी कि इस केस पर फैसला अगले आम चुनाव तक टाला जाना चाहिए। कहना कठिन है कि ऐसी अड़ंगेबाजी भरी कोशिश फिर से नहीं होगी। जो भी हो, न्याय का तकाजा यही कहता है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी कोशिश को नाकाम करे और अयोध्या मसले पर अपना फैसला सुनाने में और देर न करे। यह किसी से छिपा नहीं कि अयोध्या मामले की सुनवाई में पहले ही जरूरत से ज्यादा देरी हो चुकी है। क्या यह आदर्श स्थिति है कि उच्चतम न्यायालय करीब आठ साल बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ओर से दिए गए फैसले पर विचार करने के लिए समय निकाल सका? एक सवाल यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से जब-तब यह जानने की कोशिश क्यों की जाती है कि कोई परंपरा किसी उपासना पद्धति का अभिन्न् अंग है या नहीं? आखिर फैसले संविधान की नजर से होंगे या फिर इस आधार पर कि कोई परंपरा किसी धर्म का मूल हिस्सा है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई का रास्ता साफ करते हुए यह स्पष्ट किया कि इसे केवल जमीन के विवाद के तौर पर देखा जाएगा। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन अयोध्या में विवादित स्थल की जमीन के मालिकाना हक का निर्धारण करते समय यह देखा जाना तो आवश्यक ही है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य क्या कहते हैं।

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